झालरापाटन: "मंत्री-वसुंधरा मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते", सत्ता के नशे में चूर विकास अधिकारी ने 23 पंचायतों के हक पर डाला डाका
झालरापाटन पंचायत समिति के विकास अधिकारी महेश मीणा पर भ्रष्टाचार और पक्षपात के गंभीर आरोप। नियमों को ताक पर रखकर 7 चहेती पंचायतों को बांटे 1.55 करोड़ रुपये, जबकि 23 पंचायतों के हाथ रहे खाली। मंत्री मदन दिलावर और वसुंधरा राजे को लेकर विवादित टिप्पणी करने वाले इस अधिकारी की मनमानी से शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं ठप, जनता में भारी रोष।

झालरापाटन। "मंत्री, संतरी और वसुंधरा मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, ऊपर तक मेरी पहुंच है।" यह अहंकार भरे बोल किसी बड़े राजनेता के नहीं, बल्कि झालरापाटन पंचायत समिति में तैनात विकास अधिकारी महेश मीणा के हैं। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और सत्ता के कथित संरक्षण के अहंकार में डूबे इस अधिकारी ने लोकतंत्र की मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। विकास अधिकारी पर आरोप है कि उन्होंने नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए राज वित्त आयोग की षष्ठम योजना के तहत मिलने वाली भारी-भरकम राशि का बंदरबांट अपनी मर्जी से कर दिया।
पंचायत समिति झालरापाटन के अंतर्गत आने वाली 30 ग्राम पंचायतों के विकास का जिम्मा जिस अधिकारी के कंधों पर था, उसने पक्षपात की सारी सीमाएं लांघ दीं। बिना किसी प्रशासक की अनुमति, बिना साधारण सभा की बैठक और बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया को पूरा किए, महेश मीणा ने 1 करोड़ 55 लाख रुपये की राशि केवल अपनी सात चहेती ग्राम पंचायतों को खैरात में बांट दी। वहीं, शेष 23 ग्राम पंचायतें आज भी एक-एक फूटी कौड़ी के लिए तरस रही हैं। विकास की इस अंधी दौड़ में सबसे बड़ा हिस्सा गोविंदपुरा ग्राम पंचायत के खाते में गया, जिसे अकेले 30 लाख रुपये की स्वीकृति दे दी गई। इसके अलावा गोवर्धनपुरा को 25 लाख, अकतासा को 25 लाख, मंडावर को 25 लाख, डोंडा को 20 लाख, पिपलोद को 20 लाख और बड़ोदिया को 10 लाख रुपये इंटरलॉकिंग कार्य के लिए जारी किए गए।
हैरानी की बात यह है कि जहां करोड़ों रुपये इंटरलॉकिंग जैसे कार्यों पर लुटाए जा रहे हैं, वहीं क्षेत्र के कई सरकारी विद्यालय बारिश में जमींदोज हो चुके हैं। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में नौनिहाल पेड़ों के नीचे या असुरक्षित किराए के भवनों में पढ़ने को मजबूर हैं। प्रशासकों का स्पष्ट कहना है कि नियमानुसार किसी भी वित्तीय स्वीकृति से पहले साधारण सभा और प्रशासक स्थाई समिति की बैठक में प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है। तकनीकी मंजूरी और कार्यों की प्राथमिकता तय किए बिना सीधे बजट जारी करना सीधे तौर पर पद का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
गौरतलब है कि विकास अधिकारी महेश मीणा का विवादों से पुराना नाता रहा है। पूर्व में वर्तमान पंचायत राज मंत्री मदन दिलावर उन्हें एपीओ (पदस्थापन आदेश की प्रतीक्षा) कर चुके थे, लेकिन चर्चा है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की कथित मेहरबानी के चलते वे दोबारा झालरापाटन में टिकने में कामयाब रहे। अब यही अधिकारी खुलेआम चुनौती दे रहा है कि उसकी पहुंच इतनी ऊपर तक है कि मदन दिलावर और वसुंधरा राजे भी उसका कुछ नहीं कर सकते। इस मनमानी ने न केवल विकास कार्यों को ठप कर दिया है, बल्कि सरकार की पारदर्शिता और "जीरो टॉलरेंस" की नीति पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि क्या उच्चाधिकारी इस "स्वयंभू" अधिकारी की कार्यप्रणाली पर लगाम कसते हैं या फिर जनता का पैसा इसी तरह रसूख और चहेतों की भेंट चढ़ता रहेगा।

Pratahkal Bureau
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