झालावाड़ मेडिकल कॉलेज: ट्रॉमा सेंटर टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल
झालावाड़ मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर की मशीनों की खरीद और टेंडर शर्तों में चार बार बदलाव को लेकर अनियमितता के गंभीर आरोप लगे हैं।

झालावाड़ मेडिकल कॉलेज में प्रस्तावित ट्रॉमा सेंटर की मशीनों और उपकरणों की खरीद के लिए जारी टेंडर प्रक्रिया सवालों के घेरे में है। आरोप है कि टेंडर की शर्तों में चार बार बदलाव किए गए। वहीं, कोटा की टीजी इंटरनेशनल फर्म का नाम भी इस पूरी प्रक्रिया को लेकर चर्चा में है। करीब 50 लाख रुपये की कथित अनियमितता और कमीशनखोरी की चर्चाओं ने मामले को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि सरकारी खरीद की इस प्रक्रिया में प्राथमिकता मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है या किसी खास कारोबारी हित को साधना?
सरकार जिले के लोगों को बेहतर आपातकालीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ट्रॉमा सेंटर की सौगात देने जा रही है। इस केंद्र का उद्देश्य दुर्घटनाओं में घायल मरीजों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराना है, लेकिन इसके शुरू होने से पहले ही मशीनों की खरीद और टेंडर की शर्तों को लेकर कथित खींचतान सामने आने लगी है। जिस परियोजना से लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की उम्मीद है, उसी की खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
सूत्रों से सामने आई जानकारी के अनुसार, ट्रॉमा सेंटर के उपकरणों और मशीनों की खरीद से संबंधित टेंडर प्रक्रिया में चार बार शर्तों में बदलाव किया गया। इसके बाद यह सवाल उठने लगा है कि आखिर ऐसी कौन-सी तकनीकी आवश्यकता सामने आई, जिसके चलते टेंडर की शर्तों को बार-बार संशोधित करना पड़ा। क्या अस्पताल प्रशासन को पहले निर्धारित शर्तों में कोई तकनीकी खामी नजर आई थी? क्या विशेषज्ञों की सलाह पर बदलाव किए गए या आरोपों के अनुसार किसी खास फर्म की पात्रता के अनुरूप टेंडर की शर्तें तैयार करने की कोशिश हुई?
यदि टेंडर की शर्तों में चार बार बदलाव किया गया है तो प्रत्येक संशोधन का कारण, तकनीकी आधार और सक्षम स्तर से मिली स्वीकृति सार्वजनिक की जानी चाहिए। सरकारी टेंडर प्रक्रिया जनता के पैसे से होने वाली खरीद है। ऐसे में इसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
इस पूरे मामले में कोटा की टीजी इंटरनेशनल नामक फर्म का नाम भी चर्चा में बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, इस फर्म से जुड़े गोपाल नामक व्यक्ति के माध्यम से मशीनों के पार्ट्स और अन्य सामग्री की आपूर्ति का कारोबार किया जाता है। दावा किया जा रहा है कि मेडिकल कॉलेज में लंबे समय से इस फर्म से लाखों रुपये के पार्ट्स खरीदे जा रहे हैं और अब तक उसका कारोबार करीब 200 करोड़ रुपये से ज्यादा तक पहुंच चुका है। हालांकि, इस बड़े दावे की पुष्टि के लिए खरीद आदेशों, भुगतान विवरण, बिल और ऑडिट रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
अब सवाल यह है कि यदि मेडिकल कॉलेज में लंबे समय से एक ही फर्म से खरीदारी की जा रही है तो क्या निविदा प्रक्रिया में उसकी भागीदारी और पात्रता के सभी नियमों का पालन हुआ? क्या दूसरी कंपनियों को भी समान अवसर दिया गया? क्या टेंडर में प्रतिस्पर्धा के सभी रास्ते खुले रखे गए? सरकारी खरीद में किसी फर्म का अनुभव होना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन अनुभव के नाम पर प्रतिस्पर्धा सीमित किए जाने का आरोप गंभीर है।
इस मामले में सूत्रों के हवाले से करीब 50 लाख रुपये की कथित अनियमितता अथवा कमीशनखोरी की चर्चा भी सामने आ रही है। हालांकि, यह आरोप अभी जांच और दस्तावेजी पुष्टि का विषय है। यदि वास्तव में इतनी बड़ी रकम के लेन-देन का मामला है तो इसकी पूरी जानकारी सामने आनी चाहिए। आखिर इस रकम का आधार क्या है? किसने किससे लेन-देन किया? क्या इसमें किसी अधिकारी, कर्मचारी या बिचौलिए की भूमिका है? इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच और वित्तीय रिकॉर्ड की पड़ताल से ही मिल सकता है।
करोड़ों रुपये की सरकारी खरीद में पारदर्शिता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि मेडिकल कॉलेज का उद्देश्य मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराना है, न कि किसी सप्लायर के कारोबार को बढ़ावा देना। मशीनों की खरीद में उनकी गुणवत्ता, तकनीकी मानक, वारंटी, सर्विस नेटवर्क और बाजार दरों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। टेंडर की शर्तों में बार-बार बदलाव से प्रतिस्पर्धा बढ़ी या सीमित हुई, इसकी भी समीक्षा जरूरी है।
यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितनी कंपनियों ने टेंडर प्रक्रिया में रुचि दिखाई, कितनी कंपनियां पात्र पाई गईं, किन कारणों से किसी फर्म को पात्र या अपात्र घोषित किया गया और मशीनों की बाजार दरों की तुलना किस आधार पर की गई। इन सभी जानकारियों को सार्वजनिक करने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि ट्रॉमा सेंटर के लिए मशीनों की खरीद मरीजों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप की जा रही है या टेंडर की शर्तों से किसी कारोबारी को लाभ पहुंचाने का रास्ता तैयार हुआ है।
राजस्थान सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग से इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर टेंडर प्रक्रिया की स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराने की मांग उठ रही है। यदि शर्तों में चार बार बदलाव हुआ है तो प्रत्येक संशोधन से संबंधित फाइल, सक्षम अधिकारी की स्वीकृति, तकनीकी समिति की अनुशंसा और संबंधित फर्मों की पात्रता की समीक्षा की जानी चाहिए।
आवश्यकता पड़ने पर मौजूदा प्रक्रिया को नियमानुसार रोकने या निरस्त करने और प्रदेश स्तर पर पारदर्शी एवं प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया अपनाने पर भी विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही सभी संभावित आपूर्तिकर्ताओं को समान अवसर देने और मशीनों की गुणवत्ता का स्वतंत्र मूल्यांकन सुनिश्चित करने की जरूरत है।
ट्रॉमा सेंटर में लगने वाली मशीनों का महत्व केवल उनकी करोड़ों रुपये की कीमत तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका सीधा संबंध दुर्घटनाओं में घायल मरीजों की जिंदगी से है। ऐसे में खरीद प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका को गंभीरता से लिया जाना जरूरी है।
इस पूरे मामले में डीन और अस्पताल प्रशासन से कई सवालों के जवाब मांगे जा रहे हैं। टेंडर की शर्तें चार बार क्यों बदली गईं? टीजी इंटरनेशनल का नाम बार-बार क्यों चर्चा में आ रहा है? करीब 200 करोड़ रुपये के कारोबार का दावा कितना सही है? और 50 लाख रुपये की कथित काली दाल की चर्चा के पीछे वास्तविकता क्या है?
महाभारत में शकुनि के पासों के जरिए व्यवस्था को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश की कहानी आज भी अन्यायपूर्ण व्यवस्था के उदाहरण के रूप में याद की जाती है। झालावाड़ मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर की टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच भी इसी तरह की आशंकाएं सामने आ रही हैं। ऐसे में किसी भी विवाद की स्थिति बनने से पहले संबंधित जिम्मेदारों को तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर जवाब देना चाहिए। मरीजों को बेहतर ट्रॉमा सेंटर, गुणवत्तापूर्ण मशीनें और पारदर्शी खरीद व्यवस्था मिलना जरूरी है। आखिर इस पूरी प्रक्रिया में प्राथमिकता सेवा, सुविधा और जीवन रक्षा है या मशीनों की खरीद के जरिए कारोबारी मुनाफे का गणित, इसका जवाब जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही सामने आएगा।

Suresh Momiya, Jhalawar
नाम: सुरेश कुमार गोयल (मोमिया)
वर्तमान पद: सीनियर पत्रकार (प्रातःकाल)
कार्यक्षेत्र: झालरापाटन, जिला झालावाड़ (राजस्थान)
बीट (मुख्य विषय): राजनीति, क्राइम, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य महत्वपूर्ण विषय
परिचय
सुरेश कुमार गोयल (मोमिया) राजस्थान के झालावाड़ जिले के झालरापाटन क्षेत्र के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'प्रातःकाल' में सीनियर पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वह झालरापाटन और झालावाड़ जिले से जुड़ी राजनीति, अपराध (क्राइम), शिक्षा, स्वास्थ्य सहित विभिन्न प्रकार की क्षेत्रीय और जनहित की खबरों को नियमित रूप से कवर करते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव
पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 वर्षों का एक लंबा और व्यापक अनुभव है। वर्तमान में वह 'प्रातःकाल' के साथ-साथ निम्नलिखित समाचार पत्रों के लिए भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं:
- दैनिक बढ़ता राजस्थान
- दैनिक कोटा ब्यूरो
- दैनिक दो गज दूरी
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने वाणिज्य स्नातक (B.Com) की डिग्री हासिल की है।
