झालावाड़ मेडिकल कॉलेज: डीन कुर्सी के लिए डॉक्टरों में मची खींचतान
झालावाड़ मेडिकल कॉलेज में डीन पद की दौड़ और गुटबाजी से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित, मरीजों को इलाज के लिए करना पड़ रहा है लंबा इंतजार।

झालावाड़ मेडिकल कॉलेज में प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति को लेकर डॉक्टरों के बीच जारी आपसी खींचतान से अस्पताल की व्यवस्था पर असर पड़ रहा है।
झालावाड़ के मेडिकल कॉलेज में इन दिनों चिकित्सा सेवा का धर्म गौण और कुर्सी की राजनीति मुख्य हो गई है। अस्पताल के गलियारे मरीजों के इलाज के बजाय डीन पद की दौड़ और आपसी गुटबाजी की चर्चाओं से गुलजार हैं। यह स्थिति उस पुरानी कहावत को चरितार्थ कर रही है कि "घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने", जहां एक ओर मरीज मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी एक-दूसरे को पद से हटाने की रणनीति में व्यस्त हैं।
हाथियों की लड़ाई में घास के कुचलने की तर्ज पर, इन बड़े डॉक्टरों की आपसी खींचतान का सीधा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। कॉलेज में माहौल ऐसा बन चुका है कि प्रशासनिक कार्यों के स्थान पर विरोधी खेमे के खिलाफ फाइलें खंगालने और गोपनीय शिकायतों के पुलिंदे तैयार करने का सिलसिला तेज हो गया है। डीन पद की लालसा में डूबे कुछ चिकित्सक ऊपर तक पहुंच बनाने के प्रयासों में जुटे हैं, जिससे संस्थान की कार्यप्रणाली 'नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली' वाली कहावत के अनुरूप प्रतीत हो रही है।
वर्तमान में पदस्थापित डीन पर जिम्मेदारी से हटकर व्यापारी की भूमिका में होने के आरोप लग रहे हैं, तो वहीं उन्हें हटाने का सपना देख रहे दावेदारों का खेल भी कम विवादास्पद नहीं है। चर्चा है कि एक चिकित्सक को बिना जनमत के, महज एक राजनेता के जातिगत आशीर्वाद से डीन बनने की तीव्र लालसा है। इस सत्ता संघर्ष ने जिले की स्वास्थ्य सेवाओं को गहरी चिंता में डाल दिया है। जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि यह लड़ाई सेवा की है या निजी स्वार्थ की?
यह प्रश्न भी गंभीर है कि क्या निजी हितों के लिए अब वे लोग जिले की दशा और दिशा तय करेंगे, जिनका न तो कोई जनाधार है और न ही कोई जवाबदेही। लोगों का मानना है कि यदि इस संस्थान में जातिवाद का बीज बोया गया, तो इसका नकारात्मक प्रभाव स्थानीय विधायक और सांसद की कार्यक्षमता पर भी पड़ेगा। हालांकि, डीन का हटना लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन कुर्सी छिनने के पीछे का हाथ और उसके निहितार्थ आने वाले समय में स्पष्ट हो जाएंगे। फिलहाल, मेडिकल कॉलेज का दृश्य कुछ ऐसा है कि यहां मरीज कम और राजनीति अधिक भर्ती है, जिसके चलते मरीजों का भरोसा आईसीयू में पहुंच चुका है।

