निकाय चुनाव 2026 की आहट के साथ झालावाड़ और झालरापाटन के राजनीतिक गलियारों में संभावित प्रभारी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। चाय की दुकानों से लेकर सियासी चौपालों तक चर्चा है कि किस नेता के कंधों पर किस निकाय का चुनावी भार डाला जाएगा।

गपशप गली की चर्चाओं पर यकीन करें तो झालरापाटन नगरपालिका की 35 सीटों को साधने के लिए मनीष चांदवाड़ और झालावाड़ नगर परिषद की 45 सीटों का किला फतह करने के लिए पूर्व सभापति प्रदीप सिंह पर दांव खेलने की तैयारी की चर्चा है।

चर्चा करने वालों का कहना है कि पिछले छह सालों में दोनों नेताओं की छवि पर किसी ने ‘भ्रष्टाचार’ का दाग लगाने की जुर्रत तक नहीं की। अब यह बात अलग है कि दाग लगे ही नहीं या फिर दाग धोने वाले सर्फ का ब्रांड इतना असरदार था कि दाग दिखे ही नहीं।

सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि जब पूर्व में धर्मपत्नी जी के हाथों में कमान थी, तब मनीष चांदवाड़ ने विकास की ऐसी लकीर खींची कि विरोधी आज तक उस लकीर का सिरा ढूंढ रहे हैं।

पार्षदों के बोर्ड भुगतान, जिनकी कीमत महज तीन हजार रुपए बताई जाती है, उनका भारी-भरकम भुगतान कर दस लाख रुपए से ज्यादा का राजस्व बचाने की चर्चा हो या फिर थाने से सूरजपोल नाके तक का वह ‘विश्वप्रसिद्ध’ डिवाइडर-रोड, जिसकी तकनीक ऐसी नायाब बताई जाती है कि शायद नासा वाले भी देखकर पूछ लें, “भाई, इसका पेटेंट किसके नाम है?”

बात अगर 50 लाख रुपए के प्लॉट को 5 लाख रुपए में देने की चर्चाओं तक पहुंच जाए, तो समझिए विकास की परिभाषा ही बदल गई। किसी का जीवन संवार देना हर किसी के बस की बात थोड़े ही है।

इसी ‘अद्वितीय विकास गाथा’ के बीच 1 मई 2025 को मुख्य बाजार, कसारा बाजार में नगर की जनता द्वारा कांग्रेस के निशान के साथ ढोल-नगाड़ों से किए गए जोरदार स्वागत की तस्वीरें भी सियासी गलियारों में खूब घूमी थीं। कहा जाता है कि उस स्वागत की गूंज आज भी चुनावी गलियारों में सुनाई देती है।

वहीं, चर्चा है कि पूर्व सभापति प्रदीप सिंह का पुराना अनुभव इस बार उनका सबसे बड़ा चुनावी हथियार हो सकता है। झालावाड़ नगर परिषद की 45 सीटों पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत बताई जा रही है कि उनका नाम सामने आते ही विरोधी खेमे में हलचल शुरू होने की बात कही जा रही है।

हालांकि राजनीति में एक पुरानी कहावत है—नाम बड़ा हो या मैदान बड़ा, असली परीक्षा चुनाव के दिन होती है। चुनावी मैदान में पोस्टर, नारे, रणनीति और दावे अपनी जगह होते हैं, लेकिन आखिर में जनता की उंगली जिस बटन पर रुकती है, वही असली ‘प्रभारी’ तय करती है।

चर्चा यह भी है कि इस खबर से केवल भाजपा खेमे में ही हलचल नहीं, बल्कि विपक्षी कांग्रेस के खेमे में भी खुशी की लहर दौड़ रही है। अब यह खुशी लोकतंत्र के इस महापर्व में ‘सफाया होने के डर’ की है या फिर कुछ और, यह आने वाला समय बताएगा।

फिलहाल सियासी चौपालों पर चाय की चुस्कियां जारी हैं और चर्चाओं का बाजार गर्म है। ‘घूमता आईना’ भी अपनी जगह से सब कुछ देख रहा है। एक तरफ झालरापाटन की 35 सीटों का चक्रव्यूह है, तो दूसरी तरफ झालावाड़ की 45 सीटों का किला।

इन दोनों के बीच भाजपा के दो कथित ‘अग्निवीर’—मनीष चांदवाड़ और प्रदीप सिंह—चर्चाओं के केंद्र में हैं। अब देखना यह है कि ये दोनों धुरंधर कांग्रेस का सफाया करने निकलते हैं या चुनावी रणभूमि में खुद ही कोई नया इतिहास रचते हैं। क्योंकि राजनीति में बल्लेबाज चाहे कितना भी अनुभवी क्यों न हो, स्कोरबोर्ड जनता ही चलाती है। ‘घूमता आईना’ तो बस आईना है साहब... जो सामने आएगा, वही दिखाएगा।

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