झालावाड़। सरकार के महत्त्वाकांक्षी स्वच्छता अभियान के तहत ग्राम पंचायतों में लाखों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। गांवों की गलियों में आज भी गंदगी के ढेर आमजन का स्वागत कर रहे हैं। भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही का यह जीवंत मामला झालावाड़ जिले की ग्राम पंचायत खारपा कलां से सामने आया है, जहां कागज़ों में तो सफाई व्यवस्था पूरी तरह चमक रही है, लेकिन ज़मीनी हालात बदबू और भारी अव्यवस्था की स्याह कहानी बयान कर रहे हैं।

ग्राम पंचायत के जागरूक ग्रामीणों मदन सिंह, दुर्गा गुर्जर, भवर सिंह और ज्ञानसिंह आदि ने आक्रोश व्यक्त करते हुए बताया कि पंचायत प्रशासन ने सफाई के नाम पर बहुत बड़ी राशि के बिलों का भुगतान उठा रखा है। इसके बावजूद गांव की नालियां पूरी तरह जाम पड़ी हैं, जगह-जगह कचरे के पहाड़ नुमा ढेर लगे हैं और सड़कों पर चारों तरफ फैली गंदगी के कारण क्षेत्र में भयानक बीमारी फैलने का खतरा लगातार बना हुआ है। सूत्रों से मिली प्रामाणिक जानकारी के अनुसार, इस ग्राम पंचायत में सफाई का टेंडर भी भारी मिलीभगत और सांठगांठ के जरिए किया गया है। वर्तमान में जिस फर्म के पास यह टेंडर है, वह पास की ही दूसरी ग्राम पंचायत के सरपंच की बताई जा रही है। ऐसे में अब यह गंभीर सवाल उठ रहा है कि जब सफाई के नाम पर सरकारी खजाने से लाखों रुपए खर्च कर दिए गए, तो वह सफाई आखिर धरातल पर गई कहां?

इस पूरे मामले में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आ रहा है कि स्वच्छता अभियान के नाम पर केवल कागज़ी खानापूर्ति कर उच्चाधिकारियों को भ्रामक रिपोर्ट भेज दी गई, जबकि धरातल पर वास्तविक सफाई व्यवस्था को पूरी तरह भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। आज खारपा कलां गांव में घूमने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो "स्वच्छ भारत मिशन" के तहत दीवारों पर लिखे गए स्लोगन और नारे ही सफाई का पूरा काम देख रहे हों। ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी गहरा असंतोष है कि ज़िम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी कभी ज़मीनी निरीक्षण करने तक नहीं पहुंचते। यदि कोई पीड़ित ग्रामीण इसकी शिकायत करता भी है, तो उसे केवल कोरे आश्वासन की झाड़ू पकड़ाकर मामले को शांत करने का प्रयास किया जाता है। अब त्रस्त जनता सीधे तौर पर यह पूछ रही है कि आखिर उनके टैक्स की गाढ़ी कमाई का पैसा गांवों की सफाई में लगा है या सिर्फ फाइलों की सफाई करने में ठिकाने लगा दिया गया। खारपा कलां की इस दयनीय स्थिति ने एक बार फिर पूरे सिस्टम पर यह बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है कि स्वच्छता अभियान वास्तव में गांवों को स्वच्छ बनाने के लिए चल रहा है या केवल खर्चों के फर्जी आंकड़े चमकाने के लिए।

Pratahkal HQ

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