झालावाड़: प्रधानमंत्री आवास और सामुदायिक शौचालय निर्माण के बजट में भारी विसंगति, भ्रष्टाचार या सिस्टम की विफलता?
झालावाड़ में प्रधानमंत्री आवास योजना और सामुदायिक शौचालय निर्माण के बजट में भारी विसंगति ने सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहाँ 600 फीट के मकान के लिए मात्र डेढ़ लाख मिलते हैं, वहीं 200 फीट के शौचालय पर 5 लाख का खर्च सिस्टम की मंशा और भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रहा है। पढ़िए इस विसंगति पर एक विस्तृत रिपोर्ट।

झालावाड़। लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही और जनहित के कार्यों की पारदर्शिता हमेशा से चर्चा का विषय रही है, लेकिन वर्तमान में ग्रामीण विकास योजनाओं के बजट आवंटन को लेकर एक गंभीर विरोधाभास उभरकर सामने आ रहा है। जहाँ एक ओर आम आदमी के सिर पर छत मुहैया कराने वाली महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री आवास योजना के बजट को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सामुदायिक शौचालयों के निर्माण में होने वाले भारी-भरकम खर्च ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह स्थिति न केवल वित्तीय प्रबंधन पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि सरकारी धन के विवेकपूर्ण उपयोग की मंशा पर भी संदेह पैदा करती है।
आंकड़ों के इस खेल को समझें तो जमीनी हकीकत काफी चौंकाने वाली नजर आती है। सरकार द्वारा परंपरागत रूप से प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत लगभग 600 वर्ग फीट के मकान निर्माण के लिए लाभार्थी को डेढ़ लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इस राशि के भीतर ही लाभार्थी को निर्माण कार्य पूर्ण करना होता है, जिसमें से लगभग 30 हजार रुपये श्रम (मजदूरी) मद में चले जाते हैं। इतना ही नहीं, व्यवस्था के भीतर व्याप्त कथित 'सिस्टम' की भेंट भी 10 से 20 हजार रुपये चढ़ जाते हैं। इन तमाम चुनौतियों और सीमित बजट के बावजूद लाभार्थी अपना घर पूर्ण करने का प्रयास करता है और सरकार इसे अपनी सफलता के रूप में प्रस्तुत करती है।
इसके ठीक उलट, यदि सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण पर दृष्टि डाली जाए, तो तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। मात्र 200 वर्ग फीट के घेरे में बनने वाले एक शौचालय परिसर के लिए सरकार द्वारा पांच लाख रुपये तक की भारी राशि व्यय की जा रही है। आश्चर्य की बात यह है कि इस विशाल बजट के बावजूद निर्माण के नाम पर महज एक ईंटों का परकोटा खड़ा कर दिया जाता है। आवास जैसे बड़े निर्माण के लिए कम राशि और शौचालय जैसे लघु निर्माण के लिए अत्यधिक बजट का यह गणित समझ से परे है। इसे सिस्टम की तकनीकी खामी माना जाए, योजनाकारों की अयोग्यता या फिर सरकारी धन के बंदरबांट का संगठित तरीका, यह आज जनता के बीच सबसे बड़ा विमर्श बन गया है।
सरकारी धन जनता की गाढ़ी कमाई का हिस्सा है और उसका इस प्रकार का असंतुलित वितरण विकास की परिभाषा पर सवाल उठाता है। एक तरफ गरीब का आशियाना न्यूनतम बजट में सिमटा हुआ है, तो दूसरी तरफ सार्वजनिक निर्माण के नाम पर सरकारी खजाने से लाखों रुपये का निर्बाध प्रवाह हो रहा है। इस मामले में निष्पक्ष जांच और बजट के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विकास के नाम पर खर्च होने वाला यह पैसा वास्तव में जनहित में लग रहा है या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। अंततः, पारदर्शिता ही वह माध्यम है जिससे शासन की विश्वसनीयता बहाल हो सकती है।

Suresh Momiya, Jhalawar
नाम: सुरेश कुमार गोयल (मोमिया)
वर्तमान पद: सीनियर पत्रकार (प्रातःकाल)
कार्यक्षेत्र: झालरापाटन, जिला झालावाड़ (राजस्थान)
बीट (मुख्य विषय): राजनीति, क्राइम, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य महत्वपूर्ण विषय
परिचय
सुरेश कुमार गोयल (मोमिया) राजस्थान के झालावाड़ जिले के झालरापाटन क्षेत्र के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'प्रातःकाल' में सीनियर पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वह झालरापाटन और झालावाड़ जिले से जुड़ी राजनीति, अपराध (क्राइम), शिक्षा, स्वास्थ्य सहित विभिन्न प्रकार की क्षेत्रीय और जनहित की खबरों को नियमित रूप से कवर करते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव
पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 वर्षों का एक लंबा और व्यापक अनुभव है। वर्तमान में वह 'प्रातःकाल' के साथ-साथ निम्नलिखित समाचार पत्रों के लिए भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं:
- दैनिक बढ़ता राजस्थान
- दैनिक कोटा ब्यूरो
- दैनिक दो गज दूरी
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने वाणिज्य स्नातक (B.Com) की डिग्री हासिल की है।
