झालावाड़ जिले की पंचायत समिति इकलेरा की ग्राम पंचायत आसलपुर से सामने आई जानकारियों ने कथित भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय जागरूक ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले पाँच वर्षों में मनरेगा और अन्य मदों के तहत करोड़ों रुपये खर्च दर्शाए गए, लेकिन धरातल पर अपेक्षित विकास दिखाई नहीं देता।

ग्रामीणों के अनुसार, ग्राम पंचायत के आठ गांवों में पिछले पाँच वर्षों के दौरान मनरेगा योजना के तहत लगभग 1.05 करोड़ रुपये ग्रेवल (मिट्टी भराई) सड़कों पर, लगभग 1.50 करोड़ रुपये इंटरलॉकिंग कार्यों पर तथा करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये पत्थर खरंजा निर्माण पर व्यय दर्शाया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य संबंधित कार्य भी स्वीकृत बताए जा रहे हैं, जिन पर लगभग 1 करोड़ रुपये और खर्च होने की संभावना जताई जा रही है। ग्रामीणों का दावा है कि कुल मिलाकर लगभग 7 करोड़ रुपये के कार्यों का भुगतान हो चुका है, जबकि करीब 1 करोड़ रुपये के कार्य चुनाव से पहले दर्शाए जाने की संभावना है।

इन दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि वास्तव में इतनी बड़ी राशि खर्च की गई है, तो आठ गांवों में बेहतर और टिकाऊ सड़कें क्यों दिखाई नहीं देतीं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि ग्रेवल कार्यों के भुगतान का अनुमान प्रति ट्रैक्टर लगभग 500 रुपये के हिसाब से लगाया जाए, तो करीब 21 हजार ट्रैक्टर मिट्टी का उपयोग हुआ होगा। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इतनी बड़ी मात्रा में मिट्टी कहाँ से लाई गई और उसका रिकॉर्ड क्या है।

इसी प्रकार, पत्थर खरंजा निर्माण के लिए यदि बाजार मूल्य के आधार पर अनुमान लगाया जाए, तो लगभग 14 हजार ट्रैक्टर पत्थर की आवश्यकता बनती है। ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम पंचायत के पास इस मात्रा में खनन सामग्री के उपयोग से संबंधित आवश्यक अनुमति अथवा आपूर्ति का स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि यदि ऐसा है, तो पूरा मामला जांच का विषय बनता है।

इन परिस्थितियों में ग्रामीणों ने पंचायत समिति के विकास अधिकारी और संबंधित अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही उन्होंने पूर्व सरपंच के कार्यकाल में इन्हीं मदों पर हुए खर्च का भी सत्यापन कराने की मांग उठाई है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी धन का उपयोग नियमानुसार हुआ या नहीं।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि अभिलेख, माप पुस्तिकाएं, सामग्री की खरीद, परिवहन और कार्यस्थल पर उपलब्धता एक-दूसरे से मेल खाती हैं, तो जांच से पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। वहीं यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

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