भाजपा के गढ़ को चुनौती देने की चर्चा अब सियासी गलियारों में तेज हो गई है। विपक्ष से ज्यादा चर्चा उन अंदरूनी चेहरों की हो रही है, जिन्हें सियासत के शतरंज में अपने ही मोहरे के रूप में देखा जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि आखिर भाजपा के मजबूत किले की दीवारों में दरार कहां से पड़ रही है और भरोसा किस वजह से कमजोर हो रहा है।

सियासी माहौल में यह यक्ष सवाल बना हुआ है कि “कहां थे हम, कहां आ गए हम?” क्योंकि भरोसा ही अब धोखे का कारण बनता दिखाई दे रहा है। किले की दीवारों में दरार अक्सर बाहर से नहीं बल्कि अंदर से पड़ती है। जनता जनार्दन में पहले से मौजूद खौफ अब और बढ़ने की चर्चा है।

भाजपा का गढ़ कहा जाने वाला क्षेत्र और उस गढ़ को भेदना आसान नहीं माना जाता, लेकिन आरोप है कि साहब ने परिस्थितियों को इतना आसान बना दिया है कि कुर्सी डगमगाने लगी है। जनता की नाराजगी सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है, वहीं साहब की तिजोरी लंकेश की तरह सोने का ढेर लगा रही है।

सियासी चर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या गलत फैसलों और गलत हाथों में बागडोर सौंपकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली गई है। जनता पर राठौड़ी चलेगी तो लोगों का गुस्सा पांच साल में एक बार जरूर सामने आता है। उस समय निशान भी बदल जाते हैं और चेहरे भी।

हर गली-मोहल्ले में अब यही चर्चा होने का दावा किया जा रहा है कि साहब “सुपारी” लेकर घूम रहे हैं और सियासतदानों की कमाई तथा दौलत यानी जनमत पर डाका पड़ रहा है। भाजपा के गढ़ में उठते इन सवालों ने सियासी समीकरणों और अंदरूनी खींचतान को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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