जैसलमेर/बाड़मेर जिले के सांवा गांव की मिट्टी ने कई प्रतिभाओं को जन्म दिया है। इन्हीं में स्वर्गीय चुतराराम गढ़वीर (मेघवाल) का नाम भी शामिल है, जिन्होंने उस दौर में पैचवर्क और हैंडीक्राफ्ट को नई पहचान दी, जब यह कला सीमित दायरे तक सिमटी हुई थी। आज राजस्थान के पैचवर्क को देश-विदेश में हस्तशिल्प पहचान के रूप में सराहा जाता है, ऐसे में इसकी नींव रखने वाले शुरुआती कारीगरों में स्व. चुतराराम जी के योगदान को सम्मानपूर्वक याद किया जाना चाहिए।

पारिवारिक विवरण के अनुसार स्व. चुतराराम जी वर्ष 1971 में पाकिस्तान से भारत आए और सांवा गांव को अपना स्थायी निवास बनाया। वर्ष 1979 में उन्होंने पारंपरिक परिधानों की कशीदाकारी और लोक संस्कृति से जुड़े हस्तशिल्प कार्यों के माध्यम से अपना व्यवसाय शुरू किया। शुरुआत में यह उनके लिए जीविकोपार्जन का साधन था, लेकिन दूरदृष्टि और मेहनत के जरिए उन्होंने इस काम को नई दिशा दी।

कशीदाकारी के दौरान बचने वाले कपड़ों के टुकड़ों को आमतौर पर अनुपयोगी समझा जाता था। स्व. चुतराराम जी ने इन्हीं कतरनों में संभावनाएं देखीं। उन्होंने विभिन्न रंगों, डिजाइनों और कपड़ों के टुकड़ों को जोड़कर आकर्षक कलाकृतियां तैयार करनी शुरू कीं। यही प्रयोग आगे चलकर पैचवर्क की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

आज जिसे दुनिया “वेस्ट टू बेस्ट”, अपसाइक्लिंग और सस्टेनेबल क्राफ्ट के नाम से जानती है, उस विचार को स्व. चुतराराम जी ने दशकों पहले अपने श्रम और हुनर के जरिए साकार किया था।

वर्ष 1980 में उन्होंने सांवा में ‘गढ़ेर हस्तकला केन्द्र’ की स्थापना की। यह केवल एक व्यवसायिक संस्थान नहीं था, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार और प्रशिक्षण देने का माध्यम भी बना। उन्होंने गांव और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को इस काम से जोड़ा और हस्तशिल्प को आजीविका का साधन बनाया।

समय के साथ उनके तैयार किए गए उत्पाद स्थानीय बाजारों से निकलकर बड़े शहरों और फिर देश-विदेश तक पहुंचने लगे। इससे उनके परिवार के साथ-साथ अनेक अन्य परिवारों को भी रोजगार मिला।

पैचवर्क कला विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में प्राचीन काल से अलग-अलग रूपों में प्रचलित रही है। इसलिए किसी एक व्यक्ति को इसका आविष्कारक कहना उचित नहीं होगा। हालांकि, राजस्थान में इस कला को व्यवसायिक स्तर पर आगे बढ़ाने और इसे रोजगार से जोड़ने वाले शुरुआती कारीगरों में स्व. चुतराराम गढ़वीर का योगदान महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

अक्सर बड़े बाजार और बड़े ब्रांडों की पहचान के बीच उन कारीगरों के नाम पीछे छूट जाते हैं, जिन्होंने अपने हाथों और मेहनत से किसी कला को नई पहचान दिलाई। स्व. चुतराराम जी भी ऐसे ही गुमनाम शिल्पकारों में से एक रहे, जिनकी मेहनत ने आने वाली पीढ़ियों के लिए नई राह तैयार की।

पारिवारिक जानकारी के अनुसार उनके द्वारा स्थापित ‘लाखाराम चतुराराम’ फर्म आज भी ग्राम सांवा में संचालित है। परिवार के सदस्य आज भी हैंडीक्राफ्ट व्यवसाय से जुड़े हुए हैं और इस परंपरागत कला को आगे बढ़ा रहे हैं।

यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की विरासत है जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद राजस्थान की लोक कला और हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान दिलाने में योगदान दिया।

आज पैचवर्क राजस्थान के प्रमुख हस्तशिल्प उत्पादों में शामिल है। रंग-बिरंगी कतरनों से तैयार बैग, चादरें, कुशन, वॉल हैंगिंग, परिधान और सजावटी वस्तुएं देश के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी पसंद की जाती हैं। इस सफलता के पीछे हजारों कारीगरों की मेहनत है, लेकिन उन नींव के पत्थरों को भी याद किया जाना चाहिए जिन्होंने इस कला को आगे बढ़ाने का साहस और दृष्टि दिखाई।

स्व. चुतराराम गढ़वीर (मेघवाल) उन्हीं प्रेरणास्रोत शिल्पकारों में से एक थे। उन्होंने कपड़ों की साधारण कतरनों में संभावनाएं देखीं, उन्हें कला में बदला और कला को रोजगार से जोड़ा। उनकी यह सोच आज के आधुनिक दौर की सस्टेनेबल और पर्यावरण-अनुकूल अवधारणाओं से मेल खाती है।

सांवा की धरती के इस गुमनाम कारीगर का नाम राजस्थान की हस्तशिल्प विरासत के इतिहास में उस सम्मान के साथ दर्ज होना चाहिए, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं। वे केवल एक कारीगर नहीं थे, बल्कि राजस्थान के पैचवर्क और हैंडीक्राफ्ट की पहचान की मजबूत नींव रखने वाले उन शिल्पकारों में से एक थे, जिनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत बना हुआ है।

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