कोटा में गूंजी सिंधी संस्कृति की महिमा: राज्यपाल ने बताया संस्कृत के सबसे करीब, विधानसभा अध्यक्ष ने की बड़ी घोषणाएं
कोटा में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने सिंधी को संस्कृत के सर्वाधिक निकट बताया। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने फॉय सागर का नाम वरुण सागर करने और हेमू कालानी के पाठ को पाठ्यक्रम में शामिल करने की घोषणा की। सिंधी समाज के 24% आयकर योगदान और भाषाई संरक्षण पर केंद्रित यह विस्तृत रिपोर्ट पढ़ें।

जयपुर / कोटा। राजस्थान की शिक्षा नगरी कोटा में आज इतिहास, संस्कृति और भाषाई अस्मिता का एक अनूठा संगम देखने को मिला, जहाँ सिंधी समाज की समृद्ध विरासत को आधुनिक भारत के निर्माण का आधार स्तंभ बताया गया। कोटा विश्वविद्यालय के नागार्जुन सभागार में आयोजित 'सिंधी संस्कृति, अध्ययन एवं परम्परा' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे और विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी ने न केवल सिंधी भाषा की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डाला, बल्कि समाज के गौरवशाली अतीत को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सहेजने का आह्वान भी किया। यह संगोष्ठी राष्ट्रीय सिंधी भाषा परिषद और कोटा विश्वविद्यालय के सिंधु अध्ययन शोध पीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई, जिसने बौद्धिक विमर्श के नए द्वार खोल दिए हैं।
समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने एक बड़ा भाषाई दावा पेश करते हुए कहा कि आधुनिक भारतीय भाषाओं में सिंधी भाषा ही संस्कृत के सर्वाधिक निकट है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिंधी के लगभग 70 प्रतिशत शब्द सीधे तौर पर संस्कृत से उद्भूत हैं। राज्यपाल ने सिंधु घाटी सभ्यता की विशालता का उल्लेख करते हुए इसे मिस्र और मेसोपोटामिया से भी अधिक विकसित और परिष्कृत बताया। उन्होंने विभाजन की विभीषिका को याद करते हुए सिंधी समाज की जीवटता की सराहना की और कहा कि अपना सब कुछ खोकर भारत आए इस समाज ने अपनी कड़ी मेहनत और व्यापारिक कुशलता से देश की अर्थव्यवस्था में अमूल्य योगदान दिया है। राज्यपाल ने संत कंवरराम और शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी साधु वासवानी जैसे आध्यात्मिक गुरुओं की भूमिका को समाज की एकता का सूत्रधार बताया। उन्होंने लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हुए कहा कि 1835 से पूर्व भारत नैतिक और आर्थिक रूप से संपन्न था, जिसे अंग्रेजों ने जानबूझकर कमजोर किया।
वहीं, राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी ने सिंधी और हिंदी दोनों भाषाओं में अपने विचार रखते हुए संगोष्ठी में नई ऊर्जा भर दी। उन्होंने 19वीं सदी के विद्वान डॉ. अर्नेस्ट ट्रम्प का हवाला देते हुए सिंधी को संस्कृत की 'शुद्धतम संतान' करार दिया। देवनानी ने सिंधी परिवारों से भावुक अपील करते हुए कहा कि हर घर में प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा सिंधी भाषा में संवाद होना चाहिए ताकि यह धरोहर जीवित रहे। उन्होंने बड़ी घोषणा करते हुए बताया कि स्वतंत्रता सेनानी हेमू कालानी के बलिदान को अब पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। साथ ही, अजमेर की प्रसिद्ध फॉय सागर झील का नाम बदलकर 'वरुण सागर' करने और वहां भगवान वरुण की 15 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने समाज के आर्थिक योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि देश के कुल आयकर में 24 प्रतिशत हिस्सा सिंधी व्यापारियों का है, जो विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति में मील का पत्थर साबित होगा।
इस गरिमामयी कार्यक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि सिंधी संस्कृति केवल अतीत का हिस्सा नहीं, बल्कि आधुनिक राजस्थान और भारत की पहचान का एक अटूट प्रमाण है। चेटीचण्ड के उल्लास, अजपाक के वस्त्र और सिंधी टोपी की विरासत को संजोते हुए इस संगोष्ठी ने नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का एक सशक्त संदेश दिया है। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि सिंधु नदी की सांस्कृतिक धारा आज भी उतनी ही वेगवती है, जितनी सदियों पहले थी।

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