जयपुर। गुलाबी नगरी के शैक्षिक गलियारे आज एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय चर्चा के साक्षी बने जो न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी, बल्कि पारंपरिक उद्योगों के भविष्य को भी नई परिभाषा देगी। मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जयपुर (एमएनआईटी जयपुर) के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला ने "हस्तनिर्मित कागज़ परिपत्र अर्थव्यवस्था के लिए विकेन्द्रीकृत बायोचार-आधारित अपशिष्ट जल उपचार" विषय पर नवाचार और परंपरा के संगम को प्रस्तुत किया। 21 और 22 जनवरी 2026 को आयोजित इस उच्च स्तरीय संगोष्ठी ने यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिक तकनीक और स्थानीय कौशल का मेल ही स्थायी भविष्य की कुंजी है।

इस महामंथन की सफलता की पटकथा एमएनआईटी जयपुर, ब्रिटेन के प्रतिष्ठित लॉफबरो विश्वविद्यालय और कुमारप्पा राष्ट्रीय हस्तनिर्मित कागज़ संस्थान (केएनएचपीआई) जयपुर के त्रिकोणीय सहयोग से लिखी गई। कार्यक्रम का नेतृत्व और संयुक्त समन्वय प्रो. मधु अग्रवाल और लॉफबरो विश्वविद्यालय के डॉ. मार्क लीपर ने किया, जिनके दूरदर्शी दृष्टिकोण ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को एक मंच पर ला खड़ा किया। तकनीकी बारीकियों और शोध की गहराई को डॉ. डी. बी. दास और डॉ. साक्षी ने अपने विशिष्ट योगदान से और अधिक सशक्त बनाया।

कार्यशाला का उद्घाटन प्रो. दिलीप शर्मा (डीन, अंतरराष्ट्रीय और एलुमनाई अफेयर्स) की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ, जहाँ उन्होंने वैश्विक स्तर पर शैक्षणिक आदान-प्रदान की महत्ता को रेखांकित किया। इस अवसर पर प्रो. ए. बी. गुप्ता और रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार दोहरे ने भी अपने विचार साझा किए। प्रो. मधु अग्रवाल ने सत्रों का संचालन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि कैसे बायोचार जैसी किफायती और सुलभ तकनीक लघु उद्योगों के लिए अपशिष्ट जल प्रबंधन का एक क्रांतिकारी समाधान बन सकती है। सांगानेर के प्रसिद्ध हस्तनिर्मित कागज उद्योग से आए विशेषज्ञों ने जब अपनी धरातलीय चुनौतियों को साझा किया, तो चर्चा केवल सिद्धांतों तक सीमित न रहकर सीधे समाधान की ओर मुड़ गई।

पीएचडी और परास्नातक शोधार्थियों की तीक्ष्ण जिज्ञासा और संवादात्मक सत्रों ने कार्यशाला में प्राण फूंक दिए। यह आयोजन केवल एक अकादमिक विमर्श नहीं था, बल्कि उद्योग और शिक्षा जगत के बीच उस मजबूत सेतु का निर्माण था, जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से की जा रही थी। अंततः, इस दो दिवसीय आयोजन ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए द्वार खोलते हुए हस्तनिर्मित कागज क्षेत्र में 'सर्कुलर इकोनॉमी' या परिपत्र अर्थव्यवस्था के प्रति एक नई चेतना जागृत की है, जो आने वाले समय में राजस्थान के पारंपरिक उद्योगों को वैश्विक पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध होगी।

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