सिंधी भाषा में भारतीय संविधान का विमोचन: उपराष्ट्रपति ने की समाज के योगदान की सराहना
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने देवनागरी लिपि में प्रकाशित संविधान का विमोचन किया, सांसद शंकर लालवानी के प्रयासों से सिंधी समाज के लिए ऐतिहासिक क्षण।

नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित गरिमामयी समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और सांसद शंकर लालवानी सिंधी भाषा (देवनागरी) में भारतीय संविधान का विमोचन करते हुए।
नई दिल्ली: सिंधी भाषा दिवस के अवसर पर, “हिंदी मेरी माँ है और सिंधी भाषा मेरी मौसी है,” देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी जी के उक्त वाक्य को साकार करते हुए देश की मोदी सरकार ने सिंधी समाज को एक महत्वपूर्ण सौगात प्रदान की है। नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमामयी आयोजन में भारत के उप राष्ट्रपति श्री सी पी राधाकृष्णन ने भारत के विकास में सिन्धी समाज के योगदान की सराहना करते हुए सिंधी भाषा (देवनागरी) में प्रकाशित भारतीय संविधान का विधिवत विमोचन किया। सांसद शंकर लालवानी के प्रयासों से सिंधी भाषा दिवस 10 अप्रैल पर सिंधी भाषा संविधान का विमोचन उपराष्ट्रपति भवन में हुआ, जो सिंधी समाज के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है।
केंद्रीय मंत्री और सांसद द्वारा समाज के गौरव का उल्लेख
कार्यक्रम में केंद्रीय विधि एवं कानून मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने सिन्धी समाज की निष्ठा, लगन और परोपकार की भावना से सभी को प्रेरणा लेने की बात कही। उन्होंने सिन्धी भाषा दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा सिन्धी समाज को दिए गए बधाई संदेश का वाचन भी किया। इंदौर के सांसद श्री शंकर लालवानी ने अपने उद्बोधन में कहा कि "सिंधी समाज देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।" उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि देश की जनसंख्या का मात्र 1% होने के बावजूद देश के GDP संग्रहण में लगभग 20 प्रतिशत तथा आयकर में लगभग 24 प्रतिशत योगदान व चेरिटी में 22% सिंधी समाज का रहता है। उन्होंने आगे कहा कि "सिंधी समृद्ध भाषा है इसमें 52 अक्षर हैं और सिंधी साहित्य समृद्ध साहित्य है।"
शरणार्थी नहीं पुरुषार्थी: राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष का संबोधन
इस अवसर पर राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने अपने संबोधन में सिंधी समाज के विस्थापन से लेकर उसके सुदृढ़ होने तक के पूरे सफर का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया। उन्होंने गर्व से कहा कि "सिंधी विभाजन के बाद अपने देश में आए और वो शरणार्थी नहीं पुरुषार्थी थे, विश्व के हर देश में सिंधी बसे हुए हैं।" यह ऐतिहासिक पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगी तथा सिंधी भाषा और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगी।
देश भर से जुटे गणमान्य अतिथि
इस गौरवशाली अवसर पर देश भर से पधारे वरिष्ठ सिन्धी समाजसेवी और गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विशेष रूप से इंदौर से विशाल गिडवाणी, जयपुर से गोरधन आसनानी, मुकेश लखयानी, तुलसी संगतानी, गोविन्द गुरबानी, श्याम सतवानी और भरत आसनानी उपस्थित रहे।

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