सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का जीवन परिचय, प्रेम प्रकाश पंथ और सत्संग परंपरा
सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के जीवन, साधना, प्रेम प्रकाश पंथ, 800 पृष्ठीय प्रेम प्रकाश ग्रन्थ और उनके शिष्यों द्वारा स्थापित धार्मिक स्थलों की परंपरा से जुड़ा विस्तृत संत परिचय।

तस्वीर में प्रेम प्रकाश पंथ के संस्थापक प्रवर्तक सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की प्रतिमा का सुंदर स्वरूप नजर आ रहा है।
प्रेम प्रकाश पंथ के संस्थापक प्रवर्तक युगपुरुष कर्मयोगी आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का जीवन भक्ति, वैराग्य, साधना और सत्य सनातन धर्म के प्रचार से जुड़ा रहा। भारत वर्ष की संत-महात्माओं की सुदीर्घ परंपरा में संत शिरोमणि सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का विशेष स्थान बताया जाता है। उनका अवतरण अखण्ड भारत के सिन्ध प्रान्त में सम्वत् 1944 आषाढ़ मास की शुक्ल षष्ठी तिथि को सिन्धु नदी के पावन तट पर स्थित खण्डू गांव में हुआ।
उनके माता-पिता संत सेवी और सत्संग प्रेमी थे। इसी कारण बाल्यकाल से ही उन्हें धार्मिक वातावरण और संत-महात्माओं का संग प्राप्त हुआ। लगभग 7-8 वर्ष की आयु में ही उनमें प्रबल भक्ति भाव के संस्कार दिखाई देने लगे। पाठशाला के बीच से निकलकर जंगल में किसी वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर घंटों बैठना, दो-तीन दिन तक घर नहीं लौटना और घर पर भी भजन-सत्संग में लीन रहना उनकी दिनचर्या बन गई थी।
सद्गुरु टेऊँराम जी महाराज को दिव्य शक्ति सम्पन्न बताया जाता है। उनके बचपन से जुड़ी घटनाओं में सिन्धु नदी में स्नान के दौरान खिल्लू नामक सहपाठी बालक के डूबने की घटना का उल्लेख मिलता है। खिल्लू को डूबता देखकर वे स्वयं वस्त्रों सहित नदी में कूद गए और कुछ समय बाद उसे लेकर नदी से बाहर आए। बाहर आने के बाद खिल्लू ने सतगुरु जी और वरुण देवता, जिन्हें जल का देवता बताया गया है, के बीच हुई वार्तालाप के बारे में लोगों को बताया।
अवस्था बढ़ने पर उन्हें दुकान संभालने की जिम्मेदारी दी गई। वहां भी वे भजन-कीर्तन में लगे रहते। कोई ग्राहक आता तो उससे कहते कि वह स्वयं सामान तौलकर ले जाए और उसका मूल्य दुकान पर ही छोड़ दे। इसी प्रसंग से जुड़ी उनकी पंक्तियां थीं—“सच्चा सौदा नाम का, झूठा सब व्यवहार! नाम जपे चलता रहे, जग का कारोबार!!”
इसके बाद घर वालों ने उन्हें खेत में आम के बगीचों की देखभाल और मजदूरों से काम कराने की जिम्मेदारी दी। वहां भी वे भजन करते रहते और खेत में काम करने वाले मजदूर उनके साथ भजन करने लगते।
प्रबल वैराग्य वृत्ति के कारण उन्होंने अपना घर और गांव छोड़ दिया। पैदल भ्रमण करते हुए वे टण्डा-आदम के एक सुनसान स्थान, जंगल में रेत के टीलों पर पहुंचे और वहां तपस्या करने लगे। उन्होंने निर्विकल्प समाधि लगाई। धीरे-धीरे वहां एक कुटिया का निर्माण हुआ और सत्संग-भजन का क्रम शुरू हुआ। समय के साथ भक्तगण एकत्रित होते गए और उसी “रेत के टीले” पर संतों-महात्माओं तथा भक्तों के सहयोग से श्री अमरापुर स्थान (डिब) के नाम से मंदिर का निर्माण किया गया।
इसके बाद उन्होंने अपनी मंडली के साथ पूरे भारत में सत्य सनातन धर्म के प्रचार का कार्य शुरू किया। हिन्दू समाज में प्रचलित कई ढोंग-पाखण्ड, मांस, मछली और शराब जैसी कुरीतियों का उन्होंने खण्डन किया तथा अपने उपदेशों के माध्यम से उन्हें बंद कराने का प्रयास किया। इस कार्य के लिए उन्हें स्वार्थी तत्वों के प्रबल विरोध का सामना भी करना पड़ा, लेकिन वे सत्य नीति पर अटल रहे।
उन्होंने अपना पूरा जीवन धर्मनीति और हिन्दू सनातन धर्म के प्रचार में लगाया। 55 वर्ष की आयु में सिन्ध हैदराबाद में शनिवार के पावन दिन सम्वत् 1999 में पद्मासन मुद्रा में बैठकर अपनी सत्ता को पारब्रह्म में विलीन कर दिया। उनके द्वारा रचित 800 पृष्ठीय पावन आध्यात्मिक “प्रेम प्रकाश ग्रन्थ” और सत-साहित्य आज भी मार्गदर्शन का माध्यम बताया जाता है। इसमें भजन, दोहे, पद, छंद, कविताएं और सलोक माला आदि का समावेश है। उनके द्वारा रचित सोलह शिक्षाएं और ब्रह्म दर्शनी वाणी भी उल्लेखित हैं। “शांति के दोहे” सभी को शांति प्रदान करने वाले बताए गए हैं।
भारत विभाजन के उपरांत उनके परम शिष्य स्वामी सर्वानन्द महाराज ने लघु काशी गुलाबी नगरी जयपुर और तीर्थ नगरी हरिद्वार में श्री अमरापुर स्थान तथा श्री प्रेम प्रकाश आश्रम की स्थापना की। इन स्थानों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। श्रद्धालु एक-दूसरे का अभिवादन आचार्य श्री के मूल मंत्र “सत्नाम साक्षी” से करते हैं।
गुरु-शिष्य की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए स्वामी शांतिप्रकाश महाराज, स्वामी हरिदासराम जी महाराज और पांचवी पातशाही स्वामी भगत प्रकाश जी महाराज ने देश-विदेश में प्रेम प्रकाश मंदिरों की स्थापना की। दक्षिण भारत के रामेश्वरम् में पहली बार चार भव्य घाट—“सद्गुरु टेऊँराम घाट, स्वामी सर्वानंद घाट, स्वामी शांतिप्रकाश घाट एवम् स्वामी हरिदासराम घाट”—का निर्माण प्रेम प्रकाश मंडल द्वारा कराया गया। इन घाटों का लाभ तीर्थ यात्रियों को मिल रहा है।
हरिद्वार में “श्री अमरापुर घाट, सत्नाम साक्षी घाट, स्वामी सर्वानन्द घाट, प्रेम प्रकाश घाट, स्वामी सर्वानन्द स्मृति स्थल, गुरुमुख ध्यानकुंज” आदि की स्थापना भी की गई है। यहां भारत-माता की प्रतिमा, भारतीय सेना की वीरता एवं शौर्य के प्रतीक साहसी सैनिकों की प्रतिमा, सिन्ध के बलिदानी साहसी सम्राट दाहिरसेन की प्रतिमा, स्वतंत्रता सेनानी शहीद हेमू कालानी के फोटो चित्र और “भागीरथ दीप स्तम्भ” का निर्माण श्री प्रेम प्रकाश मंडल ट्रस्ट, श्री अमरापुर स्थान, जयपुर द्वारा कराया गया है।
महाकाल की उज्जैन नगरी में शिप्रा नदी के पावन तट पर भी “सद्गुरु टेऊँराम घाट” बना हुआ है। विश्व प्रसिद्ध कैलेंडर पंचांग में सतगुरु टेऊँराम जयंती को भी स्थान मिला है। भारतीय रेल मंत्रालय द्वारा एक ट्रेन का नाम “अमरापुर अरावली एक्सप्रेस” किया गया है। महाराज श्री के नाम से जयपुर मानसरोवर में “सतगुरु टेऊँराम गौशाला” भी बनी हुई है।
अमदाबाद के नाना चिलोडा रेलवे क्रॉसिंग पर “सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ओवर ब्रिज” (सेतु-पुलिया) बना हुआ है। जयपुर में श्री अमरापुर जल मंदिर (अन्न क्षेत्र प्रसादम) में जल और भोजन की व्यवस्था निरंतर चल रही है।
सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की आध्यात्मिक परंपरा, उनके द्वारा रचित “प्रेम प्रकाश ग्रन्थ”, सत-साहित्य, शिक्षाओं और उनके शिष्यों द्वारा स्थापित विभिन्न धार्मिक स्थलों के माध्यम से प्रेम प्रकाश पंथ की परंपरा आगे बढ़ रही है। महापुरुषों के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन और शत-शत नमन।

