जयपुर में आयोजित ’समरसता महामहोत्सव’ में राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने सशक्त, समरस और विकसित राष्ट्र निर्माण के लिए सभी की समान भागीदारी का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब आम जन जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर सेवा, सहयोग और सद्भाव के भाव से जुड़ता है, तभी समरस समाज का निर्माण होता है।

राज्यपाल श्री बागडे बुधवार को श्री पारदेश्वर महादेव मंदिर में परम पूज्य अनंत श्री विभूषित श्रीमद् जगतगुरु स्वामी श्री प्रज्ञानानंद सरस्वती के सान्निध्य में आयोजित ’समरसता महामहोत्सव’ में संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने भारतीय संस्कृति में निहित अनेकता में एकता और सामाजिक समरसता की भावना का उल्लेख किया।

राज्यपाल ने श्री यदुनाथ सरकार की पुस्तक “शिवाजी एंड हिज टाइम” का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रयाग में मुगलों ने एक अक्षय वट वृक्ष को काट कर उस पर एक बड़ा तवा इस उद्देश्य से रख दिया था कि अब वृक्ष चूंकि कट चुका है, अतः स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। किंतु कुछ समय पश्चात उस अक्षय वट वृक्ष में फिर से कपोलें फूट आईं।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार पेड़ को काटने के बाद भी उसमें से कोंपलें फूट आती हैं, उसी प्रकार भारतीय समरस समाज की सनातन शक्ति अराजक ताकतों का मुकाबला करते हुए निरंतर स्वयं को कायम रखती है।

श्री बागडे ने कहा कि ’एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना का मूल भी यही है कि धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर विभिन्न विघटनकारी शक्तियों को समाप्त कर समरस महामहोत्सव के माध्यम से जीवन के आलोक पथ से जुड़ा जाए। उन्होंने सनातन संस्कृति को मानवीय मूल्यों और ’वसुधैव कुटुम्बकम’ से जुड़ी समरस संस्कृति बताते हुए राष्ट्र प्रथम की सोच के साथ कार्य करने का आह्वान किया।

राज्यपाल ने कार्यक्रम से पहले पारदेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना की और सभी के मंगल एवं खुशहाली की कामना की। उन्होंने जगतगुरु स्वामी श्री प्रज्ञानानंद सरस्वती को अपनी श्रद्धा निवेदित की। समरसता और सामाजिक एकता के संदेश के साथ आयोजित यह महामहोत्सव राष्ट्र निर्माण में सामूहिक सहभागिता के महत्व को रेखांकित करने वाला आयोजन रहा।

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