जयपुर, 30 जुलाई 2026। ग्रामीण भारत के भविष्य, सतत विकास और आत्मनिर्भर गांवों की दिशा तय करने के उद्देश्य से विवेकानंद ग्लोबल यूनिवर्सिटी (वीजीयू) में गुरुवार को दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “ग्रामीण विकास को फिर से परिभाषित करना : बहु-विषयक परिप्रेक्ष्य एवं वैश्विक अंतर्दृष्टि” का शुभारंभ हुआ। देश-विदेश के शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, कृषि एवं ग्रामीण विकास विशेषज्ञों तथा शोधकर्ताओं की उपस्थिति में आयोजित सम्मेलन में यह संदेश दिया गया कि विकसित भारत-2047 का लक्ष्य तभी साकार होगा, जब गांव विकास की मुख्यधारा में अग्रणी भूमिका निभाएंगे।

सम्मेलन के दौरान ग्रामीण विकास के क्षेत्र में लंबे समय से उल्लेखनीय कार्य कर रहे पद्मश्री लक्ष्मण सिंह को डॉ. के. राम लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसी अवसर पर ग्रामीण विकास, नीति निर्माण, शोध, नवाचार और सामुदायिक सशक्तिकरण को समर्पित डॉ. के. राम ग्रामोत्थान अध्ययन पीठ का विधिवत शुभारंभ भी किया गया। यह अध्ययन पीठ भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े शोध, नीति संवाद, नवाचार, प्रशिक्षण और सामाजिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य करेगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ. ललित के. पंवार ने की। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक प्रगति गांवों की समृद्धि से ही संभव है। उनका कहना था कि यदि पंचायती राज संस्थाएं जवाबदेह, पारदर्शी और प्रभावी बनेंगी तो ग्रामीण विकास की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा और विकसित भारत-2047 का लक्ष्य अधिक तेजी से प्राप्त किया जा सकेगा।

मुख्य अतिथि एवं फर्स्ट इंडिया के सीईओ तथा सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी पवन अरोड़ा ने कहा कि किसी भी विकास मॉडल की सफलता केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर नहीं होती, बल्कि प्रभावी नेतृत्व, मजबूत संस्थागत व्यवस्था, पारदर्शी संवाद और जनभागीदारी उसके मूल आधार हैं। उन्होंने सरकार, विश्वविद्यालयों, मीडिया और ग्रामीण समाज के बीच बेहतर समन्वय विकसित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विकास की वास्तविक सफलता तब होगी, जब योजनाओं का लाभ अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे।

मुख्य वक्ता एवं एपीजे सत्य विश्वविद्यालय, गुरुग्राम के कुलपति प्रो. विजय वीर सिंह ने कहा कि ग्रामीण विकास का दायरा अब केवल कृषि या आधारभूत संरचना तक सीमित नहीं रह गया है। उन्होंने जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, आंगनवाड़ी सेवाओं तथा मनरेगा जैसी योजनाओं के प्रभावी समन्वय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि विभिन्न योजनाओं के एकीकृत क्रियान्वयन से ही समग्र ग्रामीण विकास संभव है।

नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक डॉ. के. रवि बाबू ने कहा कि बदलते समय में जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य, आधुनिक कृषि तकनीक, बाजार संपर्क और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की भूमिका ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती प्रदान कर सकती है। उन्होंने सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों के व्यापक उपयोग, कृषि नवाचार और संस्थागत सहयोग को समय की आवश्यकता बताया।

मुख्य संरक्षक एवं सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी डॉ. के. राम ने कहा कि ग्रामीण विकास केवल सड़क, भवन और आधारभूत ढांचे के निर्माण तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार वास्तविक विकास तब होगा, जब गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक मूल्य, तकनीकी नवाचार और सम्मानजनक आजीविका के अवसर समान रूप से उपलब्ध होंगे। उन्होंने पारंपरिक खाद्य संस्कृति एवं मोटे अनाज (मिलेट्स) के संरक्षण को भी ग्रामीण समृद्धि से जोड़ते हुए इसे भविष्य की आवश्यकता बताया।

सम्मेलन के दौरान ग्राम विकास नवयुवक मंडल, लापोरिया के संस्थापक सचिव पद्मश्री लक्ष्मण सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि किसी भी गांव का स्थायी विकास सरकारी सहायता से अधिक स्थानीय समुदाय की भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और सामूहिक प्रयासों पर आधारित होता है। उन्होंने जल संरक्षण और जनसहयोग के अपने दशकों लंबे अनुभव साझा करते हुए युवाओं से ग्रामीण विकास में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

इस अवसर पर नागौर जिले के सिंगार गांव के मेधावी विद्यार्थियों को डॉ. के. राम छात्रवृत्ति भी प्रदान की गई, ताकि ग्रामीण प्रतिभाओं को उच्च शिक्षा और शोध के लिए प्रोत्साहन मिल सके।

सम्मेलन के प्रथम दिन “नीति, सुशासन एवं ग्रामीण परिवर्तन : समावेशी और सशक्त समुदायों का निर्माण” विषय पर विशेष पैनल चर्चा आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता डॉ. यशवर्धन सिंह ने की, जबकि डॉ. एस.के. सत्य प्रभा, विनोद सिंह यादव तथा प्रो. एस. चंद्रशेखर ने अपने विचार रखे।

विशेषज्ञों ने कहा कि आज ग्रामीण विकास की अवधारणा कृषि और आधारभूत सुविधाओं से कहीं आगे बढ़ चुकी है। उनके अनुसार डिजिटल समावेशन, जलवायु अनुकूल विकास, महिला एवं युवा सशक्तिकरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, ई-गवर्नेंस, स्थानीय उद्यमिता और टिकाऊ आजीविका भविष्य के ग्रामीण भारत की नई पहचान बनेंगे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि नीति निर्माण से लेकर उसके प्रभावी क्रियान्वयन तक विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, सरकार और स्थानीय समुदायों के बीच मजबूत साझेदारी विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने विकसित भारत-2047 और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने के लिए नवाचार आधारित नीतियों, जल संरक्षण, जलवायु-स्मार्ट कृषि, अनुसंधान आधारित निर्णय प्रणाली और सामुदायिक भागीदारी को सबसे महत्वपूर्ण आधार बताया। उनका कहना था कि ग्रामीण भारत का भविष्य केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि ज्ञान, तकनीक, शोध और सामाजिक सहयोग के समन्वय से तय होगा।

कार्यक्रम के समापन पर विवेकानंद ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक एवं उपाध्यक्ष डॉ. के.आर. बागरिया ने सभी विशिष्ट अतिथियों, विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजन समिति का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन ग्रामीण विकास के क्षेत्र में शोध, नीति निर्माण, नवाचार और व्यवहारिक समाधान को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण मंच सिद्ध होगा। सम्मेलन का समापन 31 जुलाई को विभिन्न तकनीकी सत्रों, शोध-पत्र प्रस्तुतियों और विशेषज्ञ चर्चाओं के साथ होगा, जिनमें देश-विदेश के विद्वान ग्रामीण विकास के विविध आयामों पर अपने विचार साझा करेंगे।

Pratahkal Newsroom

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