महिलाओं के घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्यांकन का मुद्दा राज्यसभा में उठा
डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल ने घरेलू महिलाओं के लिए न्यूनतम बुनियादी आय की मांग करते हुए इसे राष्ट्रीय आय और जीडीपी में शामिल करने का प्रस्ताव रखा।

जयपुर, 10 मार्च 2026। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रभारी, राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने मंगलवार को राज्यसभा में देश की आधी आबादी से जुड़े एक ज्वलंत, प्रासंगिक और सामाजिक-आर्थिक मुद्दे को उठाया। उन्होंने सदन के पटल पर महिलाओं द्वारा घर और परिवार के लिए किए जाने वाले घरेलू कार्यों के आर्थिक मूल्यांकन का विषय प्रमुखता से रखते हुए कहा कि देश की महिलाओं का श्रम अब तक अनदेखा रहा है, जबकि उसका समाज और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है।
घरेलू कार्य का आर्थिक मूल्यांकन और जीडीपी में योगदान
डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने कहा कि "महिलाएं भारतीय समाज की मूल इकाई परिवार की रीढ़ हैं। परिवार के संचालन, बच्चों के पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल, भोजन व्यवस्था, घर की सफाई और अन्य दैनिक कार्यों में उनका अमूल्य योगदान रहता है।" इसके बावजूद इन कार्यों को आर्थिक दृष्टि से कोई मान्यता नहीं मिलती और न ही राष्ट्रीय आय की गणना में इन्हें शामिल किया जाता है। यदि देश की करोड़ों महिलाओं के प्रतिदिन किए जाने वाले घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्यांकन किया जाए, तो यह भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान सिद्ध होगा। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी यह तथ्य सामने आया है कि महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अवैतनिक घरेलू श्रम यदि आर्थिक मूल्य में जोड़ा जाए, तो यह किसी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का बड़ा हिस्सा बन सकता है। भारत जैसे विशाल देश में यह योगदान और भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
ठोस नीति और औपचारिक आर्थिक मान्यता की आवश्यकता
डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि "समय आ गया है कि महिलाओं के घरेलू श्रम को केवल पारिवारिक जिम्मेदारी के रूप में न देखा जाए, बल्कि उसे औपचारिक आर्थिक योगदान के रूप में मान्यता दी जाए।" उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को इस दिशा में ठोस नीति बनानी चाहिए, ताकि घरेलू महिलाओं के कार्यों को राष्ट्रीय आय की गणना में शामिल किया जा सके। डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने कहा कि महिलाओं को केवल सहानुभूति या दया की दृष्टि से देखने की बजाय उनके श्रम का सम्मान किया जाना चाहिए। समाज और व्यवस्था को यह स्वीकार करना होगा कि घर के भीतर किया जाने वाला कार्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना बाहर किया जाने वाला रोजगार या व्यवसाय।
न्यूनतम बुनियादी आय और सशक्तिकरण का प्रस्ताव
उच्च सदन में डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने यह प्रस्ताव भी रखा कि घरेलू महिलाओं के लिए न्यूनतम बुनियादी आय की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करेगी और उनके योगदान को मान्यता भी मिलेगी। इससे परिवारों की आर्थिक स्थिरता मजबूत होगी और महिलाओं की सामाजिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी। आज देश में करोड़ों महिलाएं ऐसी हैं जो पूरे दिन घर और परिवार की जिम्मेदारियों में लगी रहती हैं, लेकिन उन्हें आर्थिक रूप से निर्भर माना जाता है। यह स्थिति बदलने की आवश्यकता है। यदि उनके श्रम का आर्थिक मूल्य निर्धारित किया जाए और उन्हें न्यूनतम आय की व्यवस्था दी जाए, तो इससे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।
शब्दों से नहीं नीतिगत निर्णयों से हो सम्मान
डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि "महिलाओं का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णयों से होना चाहिए।" उन्होंने सरकार और नीति निर्माताओं से आग्रह किया कि महिलाओं के घरेलू श्रम को औपचारिक रूप से मान्यता देने और उन्हें आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में व्यापक विमर्श और ठोस कदम उठाए जाएं। उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक और आर्थिक प्रगति में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि महिलाओं के योगदान को सही मायनों में स्वीकार किया जाए और उन्हें अधिकार तथा सम्मान दिया जाए, तो यह देश के समग्र विकास के लिए भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।

Pratahkal Bureau
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