जयपुर, 15 जनवरी। गुलाबी नगरी जयपुर की महल रोड आज एक ऐतिहासिक गौरव की साक्षी बनी, जहाँ सेना दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य परेड ने न केवल भारतीय सेना के अदम्य साहस का प्रदर्शन किया, बल्कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी वैश्विक पटल पर जीवंत कर दिया। राजस्थान पर्यटन, कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा प्रस्तुत कलात्मक झांकी ने कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह को इस कदर मंत्रमुग्ध किया कि पूरा वातावरण 'भारत माता की जय' और राजस्थानी संस्कृति के जयघोष से सराबोर हो गया। यह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि राजस्थान की सदियों पुरानी वास्तुकला, पारंपरिक हस्तशिल्प और विश्व प्रसिद्ध लोक कलाओं का एक ऐसा संगम था जिसने आधुनिक पर्यटन और गौरवशाली परंपराओं के बीच एक सेतु स्थापित कर दिया।

झांकी का आगाज़ राजस्थान की सबसे लोकप्रिय और प्राचीन कठपुतली कला के साथ हुआ। झांकी के अग्रभाग में स्थापित एक विशालकाय पपेट मानो राजस्थान की सांस्कृतिक दूत बनकर आगंतुकों का पारंपरिक स्वागत कर रही थी। विशेष आकर्षण का केंद्र रहे प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार राजू भाट, जिनकी अंगुलियों के जादू पर थिरकती कठपुतलियों ने दर्शकों की सांसें थाम दीं। यह दृश्य राजस्थान की उस विशिष्ट परंपरा का जीवंत उदाहरण था, जो अतिथि देवो भव: की भावना को चरितार्थ करता है।





जैसे-जैसे झांकी आगे बढ़ी, राजस्थान के 'क्राफ्ट और स्किल्स' का बेजोड़ प्रदर्शन देखने को मिला। झांकी के मध्य भाग में प्रसिद्ध मोलेला टेराकोटा की धार्मिक और सांस्कृतिक मूर्तियों को कलाकारों द्वारा अत्यंत कुशलता से उकेरा गया था, जो राज्य की मिट्टी की सौंधी खुशबू और कलात्मकता को बयां कर रही थी। इसके साथ ही जयपुर की जगप्रसिद्ध 'ब्लू पॉटरी' और 'फड़ चित्रण' के प्रदर्शन ने राजस्थान के कुटीर उद्योगों की जीवटता को प्रदर्शित किया। पारंपरिक वेशभूषा में सजे हस्तशिल्प कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन कर यह सिद्ध कर दिया कि राजस्थान की कला आज भी अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित और समृद्ध है।

सांस्कृतिक वैभव की इस कड़ी में झांकी के ऊपरी भाग पर भरतपुर क्षेत्र के प्रसिद्ध 'फूलों की होली' और 'बम रसिया' नृत्य की ऊर्जावान प्रस्तुति दी गई। झांकी के साथ पैदल चल रहे लगभग 12 कलाकारों ने 'गैर नृत्य' के माध्यम से राजस्थान की लयबद्धता को प्रस्तुत किया। वहीं, मोरु सपेरा के नेतृत्व में महिला समूह ने विश्व प्रसिद्ध 'कालबेलिया नृत्य' से समां बांध दिया। पुराने समय के योद्धाओं के रण कौशल को प्रदर्शित करते 'कच्छी घोड़ी' नृत्य ने दर्शकों में जोश भर दिया। झांकी के पार्श्व में एक विशाल एलईडी स्क्रीन पर विभाग द्वारा निर्मित वृत्तचित्र और महलों की स्थापत्य शैली के प्रदर्शन ने तकनीकी और परंपरा का अद्भुत तालमेल पेश किया। यह आयोजन न केवल एक उत्सव था, बल्कि राजस्थान की मिट्टी के शौर्य और कला के प्रति समर्पण का एक ऐसा दस्तावेज था जिसने हर भारतीय के मन में राष्ट्रभक्ति की हिलोरें पैदा कर दीं।

Pratahkal Bureau

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