विश्व एमएसएमई दिवस पर राजस्थान का गौरव: जयपुर के ‘वीविंग विलेज’ ने स्थानीय कारीगरी को दिलाई वैश्विक पहचान
विश्व एमएसएमई दिवस पर जयपुर के वीविंग विलेज की प्रेरक सफलता कहानी सामने आई है। दो करघों से शुरू हुआ यह हस्तशिल्प उद्यम आज कई देशों में हस्तनिर्मित दरियों का निर्यात कर स्थानीय कारीगरों को वैश्विक पहचान दिला रहा है।

राजस्थान की पारंपरिक हस्तशिल्प कला आज वैश्विक बाजारों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है और इसकी एक प्रेरणादायक मिसाल जयपुर के निकट स्थित ‘वीविंग विलेज’ के रूप में सामने आई है। विश्व सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) दिवस के अवसर पर यह उद्यम स्थानीय कारीगरी, कौशल संरक्षण और निर्यात आधारित विकास की एक उल्लेखनीय सफलता कहानी बनकर उभरा है।
करीब चार दशक पहले वर्ष 1979 में गंगा सिंह गौतम ने मात्र दो करघों के साथ इस पहल की शुरुआत की थी। उस समय उनका उद्देश्य पारंपरिक दरी बुनाई कला को संरक्षित रखना और स्थानीय समुदाय के लोगों के लिए आजीविका के अवसर सृजित करना था। समय के साथ यह छोटा प्रयास गांव और आसपास के क्षेत्रों के कारीगरों को जोड़ते हुए एक व्यापक कारीगर नेटवर्क में परिवर्तित हो गया।
प्रारंभिक वर्षों में यहां तैयार की जाने वाली हस्तनिर्मित दरियां जयपुर, पानीपत, मुंबई और दिल्ली के निर्यातकों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचती थीं। हालांकि उत्पाद वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहे थे, लेकिन उनके पीछे काम करने वाले कारीगरों और उनकी कला को प्रत्यक्ष पहचान नहीं मिल पा रही थी। वर्ष 2014 के बाद वीविंग विलेज ने सीधे निर्यात बाजारों में प्रवेश करने की दिशा में कदम बढ़ाए और अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने का प्रयास शुरू किया।
उद्यम के विकास में निर्णायक मोड़ तब आया जब उसे पहला अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन ऑर्डर प्राप्त हुआ। अमेरिका के एक ग्राहक द्वारा खरीदी गई हस्तनिर्मित जूट की दरी ने वैश्विक बाजार में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए। इसके बाद डेनमार्क के एक फर्नीचर ब्रांड के साथ व्यावसायिक संबंध स्थापित हुए और कंपनी की पहुंच अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, इटली, अर्जेंटीना तथा संयुक्त अरब अमीरात सहित अनेक देशों तक फैल गई।
वर्ष 2020 में वीविंग विलेज ने स्वयं को एक खुदरा ब्रांड के रूप में स्थापित करते हुए ऑनलाइन माध्यमों से सीधे अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक पहुंच बनानी शुरू की। इस रणनीतिक बदलाव का सकारात्मक प्रभाव कंपनी की बिक्री पर भी दिखाई दिया। उद्यम के अनुसार, उसका निर्यात राजस्व शुरुआती लगभग 40 हजार डॉलर से बढ़कर 28 लाख डॉलर तक पहुंच गया है, जो उसकी निरंतर प्रगति और वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
वीविंग विलेज की सबसे बड़ी विशेषता उसके उत्पादों की पूर्णतः हस्तनिर्मित प्रकृति है। यहां तैयार की जाने वाली प्रत्येक दरी बिना किसी मशीन के बनाई जाती है, जिससे हर उत्पाद में कारीगर की विशिष्ट कला, कौशल और व्यक्तिगत पहचान झलकती है। मशीन आधारित उत्पादन के बढ़ते दौर में यह विशेषता ही ब्रांड को वैश्विक बाजार में अलग पहचान प्रदान कर रही है।
बढ़ती मांग के बावजूद उद्यम ने मशीन आधारित उत्पादन को अपनाने के बजाय कारीगरों के प्रशिक्षण और कौशल विकास पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। आसपास के गांवों में नई पीढ़ी को दरी बुनाई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे न केवल पारंपरिक कला का संरक्षण हो रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं। इससे अनेक परिवारों को अपने गांव में ही स्थायी आय का स्रोत उपलब्ध हुआ है।
दरी निर्माण से आगे बढ़ते हुए वीविंग विलेज अब राजस्थान की अन्य पारंपरिक हस्तशिल्प विधाओं को भी वैश्विक मंच प्रदान करने की दिशा में कार्य कर रहा है। कंपनी की योजना अपने उत्पाद पोर्टफोलियो में क्षेत्र के अन्य हस्तनिर्मित उत्पादों को शामिल करने की है, ताकि अधिक से अधिक कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच मिल सके।
गंगा सिंह गौतम का कहना है कि भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए आज वैश्विक बाजारों तक पहुंच पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल हो गई है। उनके अनुसार गुणवत्ता, प्रभावी विपणन रणनीति और डिजिटल मंचों का बेहतर उपयोग छोटे उद्यमों को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बना सकता है।
दो करघों से शुरू हुई यह यात्रा आज हजारों संभावनाओं का प्रतीक बन चुकी है। वीविंग विलेज न केवल राजस्थान की पारंपरिक कारीगरी को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहा है, बल्कि यह भी साबित कर रहा है कि स्थानीय कौशल, नवाचार और दृढ़ संकल्प के बल पर ग्रामीण भारत के उद्यम वैश्विक बाजारों में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकते हैं।

Pratahkal Bureau
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