राजस्थान निजी सहायक संवर्ग कैडर रिव्यू में देरी पर कर्मचारियों का रोष
बजट घोषणा के एक वर्ष बाद भी आदेश जारी नहीं होने से निजी सहायक संवर्ग के कर्मचारियों ने आंदोलन की चेतावनी दी है।

राजस्थान के प्रशासनिक गलियारों में उपेक्षा और उदासीनता का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। सरकार द्वारा बजट घोषणा वर्ष 2025-26 के अंतर्गत अधीनस्थ विभागों के मंत्रालयिक कर्मचारियों के लिए किए गए कैडर रिव्यू के वादे को एक वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, किंतु इस घोषणा का लाभ निजी सहायक संवर्ग के कर्मचारियों को अब तक नहीं मिल सका है। इस विलंब के कारण न केवल कर्मचारियों में गहरा असंतोष व्याप्त है, बल्कि उनके भविष्य पर भी अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
विवाद की जड़ में सरकार की वह घोषणा है जिसमें बिंदु संख्या 97.02.01 के माध्यम से अधीनस्थ विभागों के मंत्रालयिक कर्मचारियों के कैडर रिव्यू का आश्वासन दिया गया था। इस घोषणा का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों के लिए पदोन्नति के अवसरों को सुदृढ़ करना और सेवा संबंधी जटिल विसंगतियों का निवारण करना था। राजस्थान निजी सहायक संवर्ग महासंघ के अनुसार, उसी बजट घोषणा के तहत लिपिक वर्ग का पुनर्गठन आदेश 14 अक्टूबर, 2025 को ही जारी किया जा चुका है, जबकि उसी संवर्ग का अभिन्न अंग होने के बावजूद निजी सहायक संवर्ग को इससे पूरी तरह वंचित रखा गया है।
महासंघ ने इस भेदभावपूर्ण रवैये पर कड़ा एतराज जताया है। उनका तर्क है कि ऐतिहासिक रूप से दोनों संवर्गों की कैडर रिव्यू प्रक्रिया एकसमान रही है और पूर्व में भी इनके आदेश संयुक्त रूप से ही जारी किए जाते रहे हैं। एक ही संवर्ग के दो अंगों के साथ अपनाई जा रही यह दोहरी नीति निजी सहायक संवर्ग के उन हजारों कर्मचारियों के लिए अभिशाप बन गई है, जो वर्षों से पदोन्नति की बाट जोह रहे हैं। संगठन के अनुसार, इस देरी ने न केवल कर्मचारियों का मनोबल गिराया है, बल्कि विभाग की समग्र कार्यक्षमता को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है।
राजस्थान निजी सहायक संवर्ग महासंघ के प्रदेश महामंत्री श्री पृथ्वी सिंह राठौड़ ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि बजट घोषणाओं का क्रियान्वयन समयबद्ध होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वित्त विभाग में लंबे समय से लंबित पड़ी कैडर रिव्यू की पत्रावली पर अविलंब आदेश जारी नहीं किए गए, तो कर्मचारी अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन का कठिन रास्ता चुनने को मजबूर होंगे। यह मामला अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि कर्मचारियों के धैर्य की परीक्षा का बन चुका है, जिसका समाधान समय रहते न किया गया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

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