राजस्थान दिवस: जेकेके में मंचित हुआ विश्व का पहला नाटक समुद्र मंथन
राजस्थान पर्यटन विभाग के स्थापना दिवस समारोह में उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी की उपस्थिति में 100 कलाकारों ने पौराणिक कथा और आधुनिक सरोकारों का संगम प्रस्तुत किया।

राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा राजस्थान दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भव्य श्रृंखला के अंतर्गत मंगलवार को जयपुर के जवाहर कला केंद्र (JKK) में विश्व के पहले नाटक 'समुद्र मंथन' का जीवंत मंचन किया गया। इस गौरवमयी अवसर पर प्रदेश की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत कर कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के रंगमंडल द्वारा प्रस्तुत इस महाकाव्यात्मक नाटक का निर्देशन विख्यात निर्देशक चितरंजन त्रिपाठी ने किया, जिसमें 100 से अधिक मंझे हुए कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से विशेष महत्व रखने वाले इस नाटक की सबसे खास बात यह रही कि इस कथा को नाट्य शास्त्र के जनक भरतमुनि द्वारा विश्व की पहली नाट्य प्रस्तुति के रूप में मान्यता प्राप्त है। नाटककार आसिफ अली ने इस प्राचीन पौराणिक आख्यान को अत्यंत कुशलता के साथ समसामयिक घटनाचक्र से जोड़ते हुए एक नई परिभाषा दी। नाटक की प्रस्तावना ही एक गहरे वैचारिक प्रश्न से होती है कि 'हमें आखिरकार नाटक से क्या मिलेगा? हम जीवन के अन्य जरूरी विषयों के स्थान पर कला, साहित्य और नाटकों पर मंथन क्यों करें?' इस गूढ़ प्रश्न का सार्थक उत्तर दर्शकों को नाटक के चरमोत्कर्ष में प्राप्त होता है। उल्लेखनीय है कि देश भर में इस नाटक की 25 से अधिक सफल प्रस्तुतियां दी जा चुकी हैं।
निर्देशक चितरंजन त्रिपाठी का विलक्षण निर्देशकीय कौशल पूरी प्रस्तुति के दौरान बार-बार उभर कर सामने आया। मंच पर एक विशाल स्क्रीन के माध्यम से उकेरे गए मोहक दृश्यों ने दर्शकों की स्मृति में अमिट छाप छोड़ी। नाटक की मंच-परिकल्पना और गतिशील संगीत ने कथानक को इतना रोमांचक बना दिया कि दर्शकों को पलक झपकने तक का समय नहीं मिला। आरंभ से अंत तक ऊर्जा का वही प्रवाह बना रहा, जिसने आधुनिकता से शुरू होकर पौराणिक युग की यात्रा की और पुनः वर्तमान में लौटकर दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित किया। नाटक समाज से प्रश्न करता है कि 'आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम मंथन करना क्यों भूल गए? हम आने वाली पीढ़ी और पर्यावरण के प्रति अपने दायित्वों से क्यों विमुख हैं और किस दुनिया की खोज में अपने मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य एवं मौलिक विचारों से समझौता कर रहे हैं?'
कथानक के अनुसार, जब ऋषि दुर्वासा के शाप से देवराज इंद्र श्रीहीन और शक्तिहीन हो जाते हैं, तब राक्षस-राज बलि इस अवसर का लाभ उठाकर स्वर्ग पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लेता है। असुरों की विजय से पूरी सृष्टि पर राक्षसी प्रवृत्तियाँ हावी होने लगती हैं। तब ब्रह्मा जी के परामर्श पर इंद्र सहित समस्त देवता नारायण की शरण में जाते हैं। भगवान विष्णु उन्हें क्षीर सागर के मंथन का आदेश देते हैं ताकि सृष्टि से विलुप्त हो चुके सत्य और सार को पुनः प्राप्त किया जा सके।
यह नाटक वर्तमान समाज को एक स्पष्ट चेतावनी देता है कि विकास की तीव्र गति के साथ उत्पन्न होने वाले दुष्प्रभावों को हम अनदेखा कर रहे हैं। जिस प्रकार समुद्र मंथन से केवल अमृत ही नहीं वरन विष भी निकला था, जिसे महादेव ने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की थी; वैसे ही आज के विकास से प्लास्टिक, केमिकल गैस और दूषित हवा-पानी के रूप में 'विष' निकल रहा है। निर्देशक ने आधुनिकता और पौराणिकता का अनूठा सामंजस्य बिठाते हुए इस महाकाव्य की काव्यात्मक सुंदरता को अक्षुण्ण रखा। 'समुद्र मंथन' की यह प्रस्तुति केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानव जाति के अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण हेतु चिंतन का एक सशक्त आह्वान बनकर उभरी।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
