भारत की गौरवशाली रेल विरासत को संरक्षित करने की दिशा में पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे ने एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (डीएचआर) के ऐतिहासिक 4-6-2 पैसिफिक श्रेणी के स्टीम इंजन संख्या 808-सी क्लास एनजी लोको का सफलतापूर्वक नवीनीकरण किया है। शताब्दी वर्ष पुराने इस दुर्लभ स्टीम इंजन को मालीगांव स्थित पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे मुख्यालय परिसर में अपग्रेडेड विरासत प्रदर्शनी के रूप में स्थापित किया गया है।

नवीनीकृत विरासत इंजन का उद्घाटन 26 मई 2026 को पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के महाप्रबंधक श्री चेतन कुमार श्रीवास्तव ने वरिष्ठ रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की उपस्थिति में किया। रेलवे अधिकारियों के अनुसार यह पहल भारतीय रेलवे की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने और नई पीढ़ी को स्टीम युग की इंजीनियरिंग उत्कृष्टता से परिचित कराने की दिशा में अहम कदम है।

वर्ष 1914 में निर्मित यह ऐतिहासिक स्टीम इंजन नॉर्थ ब्रिटिश लोकोमोटिव कंपनी लिमिटेड, ग्लासगो (यू.के.) द्वारा तैयार किया गया था। स्टीम इंजन संख्या 808 भारत की रेल विरासत का एक दुर्लभ प्रतीक माना जाता है। यह इंजन पहले से ही मालीगांव स्थित पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे मुख्यालय परिसर में प्रदर्शित था, लेकिन अब व्यापक मरम्मत, पेंटिंग और तकनीकी नवीनीकरण कार्यों के बाद इसे नया स्वरूप दिया गया है।

पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के महाप्रबंधक के मार्गदर्शन और प्रेरणा में यह जीर्णोद्धार कार्य न्यू बंगाईगाँव स्थित कैरेज एंड वैगन कारखाना द्वारा पूरा किया गया। नवीनीकृत इंजन को सजावटी रोशनी, वास्तविक ध्वनि प्रभाव और कृत्रिम धुएं की विशेष व्यवस्था से सुसज्जित किया गया है, जिससे यह प्रदर्शनी रेल यात्रियों, पर्यटकों और रेल विरासत में रुचि रखने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है।

स्टीम इंजन संख्या 808 प्रसिद्ध 4-6-2 पैसिफिक क्लास स्टीम लोकोमोटिव श्रेणी से संबंधित है, जिसे वर्ष 1914 में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के अधीन सेवा के लिए शामिल किया गया था। अपने जुड़वां इंजन संख्या 807 के साथ इस इंजन ने डीएचआर के किशनगंज विस्तार सेक्शन में 800 टन तक की भारी मालगाड़ियों को खींचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वर्ष 1948 में सिलीगुड़ी-किशनगंज लाइन को मीटर गेज में परिवर्तित किए जाने के बाद यह इंजन सिलीगुड़ी में शंटिंग पायलट के रूप में कार्य करता रहा। 1960 के दशक में सेवामुक्त होने तक इसने रेलवे परिचालन में अपनी भूमिका निभाई। वर्तमान में संरक्षित यह स्टीम इंजन भारतीय रेलवे के वाष्प युग और उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता की ऐतिहासिक याद के रूप में स्थापित है।

स्टीम इंजन संख्या 808 के इस व्यापक जीर्णोद्धार ने ऐतिहासिक रेल संपत्तियों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे की प्रतिबद्धता को फिर मजबूत किया है। साथ ही यह पहल भारत में स्टीम इंजनों की विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने और रेलवे इतिहास को संरक्षित रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

Pratahkal Bureau

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