भारतीय रेलवे के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ रहा है, जहाँ पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों की गड़गड़ाहट अब एक 'मूक क्रांति' में बदल गई है। नई दिल्ली से लेकर देश के सुदूर कोनों तक, भारतीय रेल ने नवंबर 2025 तक अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क का लगभग 99.2 प्रतिशत विद्युतीकरण पूर्ण कर एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने इसे दुनिया की सबसे व्यापक विद्युतीकृत रेल प्रणालियों की अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया है। यह केवल पटरियों के ऊपर बिछते तारों का जाल नहीं है, बल्कि विकसित भारत की उस गति का परिचायक है, जो कभी 2004 से 2014 के बीच महज 1.42 किलोमीटर प्रति दिन की सुस्त रफ्तार से चलती थी और आज 15 किलोमीटर प्रति दिन से अधिक की तूफानी गति से आधुनिकीकरण के लक्ष्य को भेद रही है।

इस महाअभियान की जड़ें एक सदी पीछे जाती हैं, जब 1925 में बॉम्बे विक्टोरिया टर्मिनस और कुर्ला हार्बर के बीच देश की पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन ने दस्तक दी थी। उस समय की वह 1500 वोल्ट डीसी सिस्टम वाली छोटी सी शुरुआत आज 69,427 रूट किलोमीटर के विशाल साम्राज्य में तब्दील हो चुकी है। गौरतलब है कि आजादी के समय देश के पास मात्र 388 रूट किलोमीटर का विद्युतीकृत मार्ग था, लेकिन पिछले एक दशक ने इस पूरी तस्वीर को ही बदल कर रख दिया है। 2014 से 2025 के बीच अकेले 46,900 रूट किलोमीटर का विद्युतीकरण किया जाना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय रेल अब डीजल की कालिख को पीछे छोड़ स्वच्छ और हरित भविष्य की ओर मजबूती से कदम बढ़ा चुकी है।

वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो भारत का 70,001 आरकेएम ब्रॉड गेज नेटवर्क पूर्ण विद्युतीकरण की दहलीज पर खड़ा है। देश के 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अब पूरी तरह से शत-प्रतिशत विद्युतीकृत हो चुके हैं। अब केवल राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम और गोवा जैसे पांच राज्यों में ही अंतिम चरण का कुछ शेष कार्य बचा है, जो कुल नेटवर्क का मात्र 0.8 प्रतिशत यानी 574 आरकेएम है। राजस्थान में 93 किलोमीटर और असम में 197 किलोमीटर जैसे छोटे खंडों पर काम पूरा होते ही भारतीय रेल पूर्णतः 'डीजल मुक्त' होने का गौरव प्राप्त कर लेगी। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत ने चीन, जापान और रूस जैसे दिग्गज देशों को भी पीछे छोड़ दिया है, जहाँ स्विट्जरलैंड के बाद भारत का 99.2 प्रतिशत का आंकड़ा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मिसाल बन गया है।

इस परिवर्तन का सबसे चमकदार पहलू सौर ऊर्जा का एकीकरण है। 2014 में जहाँ रेलवे की सौर क्षमता केवल 3.68 मेगावाट थी, वह नवंबर 2025 तक बढ़कर 898 मेगावाट हो गई है। यह लगभग 244 गुना की वृद्धि है। आज 2,626 रेलवे स्टेशनों पर सौर पैनल अपनी ऊर्जा बिखेर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस सौर ऊर्जा का 70 प्रतिशत हिस्सा सीधे ट्रेनों को चलाने यानी 'ट्रैक्शन' के लिए उपयोग किया जा रहा है, जबकि शेष हिस्सा स्टेशनों और कार्यशालाओं को रोशन कर रहा है। रेलवे ने अपनी निर्माण तकनीक में भी क्रांतिकारी बदलाव किए हैं, जहाँ 'बेलनाकार मैकेनाइज्ड फाउंडेशन' और 'स्वचालित वायरिंग ट्रेनों' का उपयोग कर मैन्युअल खुदाई और धीमी वायरिंग की बाधाओं को खत्म कर दिया गया है।

भारतीय रेल का यह मिशन अब केवल एक तकनीकी अपग्रेड नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है। डीजल की तुलना में 70 प्रतिशत अधिक किफायती होने के कारण यह न केवल देश की ऊर्जा सुरक्षा को सशक्त कर रहा है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम कर भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक हरित परिवहन प्रणाली सुनिश्चित कर रहा है। पटरियों पर पसरी यह बिजली की लहर भारत की आकांक्षाओं को गति दे रही है, जहाँ हर नया विद्युतीकृत मार्ग एक स्वच्छ, तेज और परस्पर जुड़े हुए विकसित भारत का वादा करता है। रेल मंत्रालय के नेतृत्व में यह सफर अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर है, जो भारतीय परिवहन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।

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Pratahkal Newsroom

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