नाबार्ड ने मनाया 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस, ग्रामीण शिल्पकारों के सशक्तिकरण पर जोर
नाबार्ड राजस्थान ने जयपुर में 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया। “विकसित भारत के लिए ग्रामीण शिल्पकारों का सशक्तिकरण” विषय पर तकनीकी उन्नयन, डिजाइन, ऋण, बाजार और कौशल विकास पर चर्चा हुई।

तस्वीर में नाबार्ड राजस्थान क्षेत्रीय कार्यालय में आयोजित 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर मुख्य महाप्रबंधक डॉ. आर. रवि बाबू और पद्मश्री सम्मानित शिल्पकार श्री राम किशोर छीपा बैठक को संबोधित करते हुए नजर आ रहे हैं।
नाबार्ड राजस्थान क्षेत्रीय कार्यालय में “विकसित भारत के लिए ग्रामीण शिल्पकारों का सशक्तिकरण” विषय के साथ 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन नाबार्ड राजस्थान के मुख्य महाप्रबंधक डॉ. आर. रवि बाबू और पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात बगरू शिल्पकार श्री राम किशोर छीपा ने किया।
उद्घाटन संबोधन में डॉ. आर. रवि बाबू ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह दिवस 1905 के स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में मनाया जाता है, जिसने स्वदेशी उत्पादों और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का प्रथम आयोजन वर्ष 2015 में चेन्नई में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया था।
डॉ. रवि बाबू ने कहा कि नाबार्ड समेकित ग्रामीण विकास के लिए कृषि एवं गैर-कृषि दोनों क्षेत्रों को प्रोत्साहित कर रहा है। हथकरघा गणना 2019-20 का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि देश में लगभग 35 लाख परिवार हथकरघा गतिविधियों से जुड़े हैं, जबकि राजस्थान में 10,090 बुनकर इस क्षेत्र में कार्यरत हैं। इनमें महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा कि हथकरघा क्षेत्र आजीविका सृजन, महिला सशक्तिकरण तथा पारंपरिक विरासत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने हथकरघा एवं हस्तशिल्प क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए तकनीकी उन्नयन, डिजाइन नवाचार, ऋण उपलब्धता, विपणन संपर्क तथा विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिल्पकारों की आय में वृद्धि, आजीविका सुरक्षा और जमीनी स्तर की समस्याओं के समाधान के लिए सभी हितधारकों को समन्वित प्रयास करने होंगे।
डॉ. रवि बाबू ने नाबार्ड की विभिन्न पहलों की जानकारी देते हुए बताया कि राजस्थान के 23 उत्पादों के लिए जीआई पंजीकरण एवं अधिकृत उपयोगकर्ता पंजीकरण, ग्रामीण मार्ट, ग्रामीण हाट, उत्पादक संगठनों का संवर्धन, प्रदर्शनियों का आयोजन तथा कौशल एवं उद्यमिता विकास कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
इस अवसर पर पद्मश्री सम्मानित बगरू शिल्पकार श्री राम किशोर छीपा ने भारत की विविध हथकरघा परंपराओं के समन्वय की वकालत की। उन्होंने बगरू प्रिंट और चंदेरी साड़ियों के फ्यूजन का उदाहरण देते हुए कहा कि इस प्रकार के नवाचार पारंपरिक कला को संरक्षित रखते हुए नए बाजार अवसर सृजित कर सकते हैं। उन्होंने नागरिकों से शिल्पकारों के समर्थन और भारतीय वस्त्र विरासत के संरक्षण के लिए सप्ताह में कम से कम एक दिन हथकरघा वस्त्र पहनने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में प्रौद्योगिकी अपनाने, डिजाइन नवाचार, शिल्पकार संगठनों को सशक्त बनाने तथा शिल्पकार सशक्तिकरण के लिए हितधारकों के समन्वय जैसे विषयों पर चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने हथकरघा एवं हस्तशिल्प क्षेत्र से संबंधित विभिन्न योजनाओं, चुनौतियों और अवसरों पर विचार-विमर्श किया। साथ ही वित्तीय समावेशन, कौशल विकास, विपणन सहायता और संस्थागत सहयोग को मजबूत बनाने के उपायों पर भी चर्चा की गई।
कार्यक्रम के अंत में आयोजित संवादात्मक सत्र में शिल्पकारों और अन्य हितधारकों ने अपने अनुभव साझा किए तथा राजस्थान के हथकरघा एवं हस्तशिल्प क्षेत्र के सतत विकास के लिए सहयोगात्मक उपायों पर विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम में सुश्री अर्चना सुराणा, संस्थापक एवं निदेशक, आर्च कॉलेज ऑफ डिजाइन एंड बिजनेस; राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिल्पकार श्री राज कुमार पाण्डेय; डॉ. संतोष कुमार धनोपिया; एसएलबीसी, विकास आयुक्त (हस्तशिल्प), जिला उद्योग केंद्र (डीआईसी) तथा विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने अपने विचार व्यक्त किए। इसके अतिरिक्त विकास आयुक्त (हथकरघा), केवीआईसी, ट्राइफेड, स्वयंसेवी संस्थाओं, शिल्पकार समूहों तथा अन्य हितधारकों ने भी कार्यक्रम में भागीदारी की। कार्यक्रम में तकनीकी उन्नयन, बाजार संपर्क, वित्तीय समावेशन और कौशल विकास के जरिए राजस्थान के हथकरघा एवं हस्तशिल्प क्षेत्र को सशक्त बनाने पर सहयोगात्मक प्रयासों को प्रमुखता दी गई।

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