जयपुर, 21 दिसंबर 2025।

अरावली पर्वतमाला जैसे संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व के पर्यावरणीय विषय पर राजनीति के आरोपों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने तथ्यों और न्यायिक आदेशों के आधार पर अपना पक्ष स्पष्ट किया है। भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा यह दावा करना कि “90 प्रतिशत अरावली समाप्त हो जाएगी”, न केवल असत्य है बल्कि जनता को गुमराह करने का प्रयास भी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अरावली से जुड़े सभी मानदंड और परिभाषाएँ किसी राजनीतिक निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट, लिखित और बाध्यकारी आदेशों पर आधारित हैं।

राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि लगभग ढाई अरब वर्ष पुरानी और 700 किलोमीटर लंबी विश्व की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली की सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय लंबे समय से गंभीर है। न्यायालय द्वारा यह तय किया गया है कि आसपास के भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊँचाई वाली भू-आकृतियों को ही ‘अरावली हिल्स’ माना जाएगा। यह परिभाषा हाल की नहीं है, बल्कि 8 अप्रैल 2005 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में तय की गई थी और कांग्रेस शासनकाल में वर्षों तक प्रभावी रूप से लागू रही।

उन्होंने बताया कि 20 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अरावली संरक्षण और खनन नियमन को लेकर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नेतृत्व में गठित समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया। इस समिति का गठन 9 मई 2024 को अरावली क्षेत्र में अवैध खनन से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान किया गया था, जिसमें राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल थे। समिति की रिपोर्ट पर विस्तृत विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम निर्णय आया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं थी।

राजेंद्र राठौड़ ने यह भी रेखांकित किया कि अरावली क्षेत्र में खनन नियंत्रण को लेकर औपचारिक और स्पष्ट परिभाषा सबसे पहले राजस्थान के पास ही थी, जो 2002 की समिति रिपोर्ट और रिचर्ड मर्फी के 1968 के लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन पर आधारित है। इसी के अनुसार 100 मीटर या उससे अधिक स्थानीय ऊँचाई वाली पहाड़ियों और उनकी ढलानों पर खनन पूर्णतः प्रतिबंधित है। राजस्थान में 9 जनवरी 2006 से इस नियम का सख्ती से पालन हो रहा है और तब से ऐसी पहाड़ियों में कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं किया गया।

उन्होंने कहा कि यह तथ्य भी रिकॉर्ड पर है कि 19 अगस्त 2003 को जिलेवार नक्शे तैयार करने के निर्देश स्वयं अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते जारी हुए थे। ऐसे में वर्षों तक लागू रही इसी व्यवस्था को आज गलत बताना, न्यायिक निर्णय को राजनीतिक रंग देने का प्रयास प्रतीत होता है। राठौड़ ने आरोप लगाया कि अशोक गहलोत को अब अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेताओं का समर्थन नहीं मिल पा रहा है और इसी कारण वे अरावली जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक दिखावे का सहारा ले रहे हैं।

प्रेसवार्ता के अंत में राजेंद्र राठौड़ ने दो टूक कहा कि अरावली पूरी तरह सुरक्षित है और राज्य सरकार का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन का संरक्षण और कानून का अक्षरशः पालन सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी। इस मुद्दे पर भ्रम फैलाने के बजाय तथ्यों और न्यायिक आदेशों का सम्मान करना ही जनहित में है।

Pratahkal Bureau

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