एमपीयूएटी में कृषि अवशेषों से बैटरी सामग्री का नवाचार, आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम
उदयपुर के एमपीयूएटी में वैज्ञानिकों ने कृषि अवशेषों से उन्नत बैटरी सामग्री तैयार करने की तकनीक विकसित की है। मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने नवाचार का अवलोकन कर वैज्ञानिकों के प्रयासों की सराहना की।

उदयपुर स्थित महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) में कृषि अवशेषों से उन्नत बैटरी सामग्री तैयार करने की दिशा में विकसित की जा रही अभिनव तकनीक का मुख्य सचिव श्री वी. श्रीनिवास एवं कृषि आयुक्त श्री नरेश कुमार गोयल ने अवलोकन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के नवीकरणीय ऊर्जा अभियांत्रिकी विभाग का दौरा कर वैज्ञानिकों से तकनीक के विकास, उपयोगिता और संभावित व्यावसायिक विस्तार को लेकर विस्तृत चर्चा की।
एमपीयूएटी के वैज्ञानिकों ने खेती से निकलने वाले कृषि अवशेषों का उपयोग कर बैटरी निर्माण में काम आने वाली विशेष एवं उन्नत सामग्री विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। यह पहल कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक एवं उपयोगी रूपांतरण के साथ पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी तकनीक के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
मुख्य सचिव श्री वी. श्रीनिवास ने वैज्ञानिकों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि कृषि क्षेत्र से जुड़े ऐसे शोध एवं नवाचार राज्य और देश के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। उन्होंने वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए समाज एवं राष्ट्रहित में इसी प्रकार के अनुसंधान कार्य निरंतर जारी रखने के लिए शुभकामनाएं दीं।
उन्होंने कहा कि कृषि अवशेषों से बैटरी निर्माण में उपयोगी सामग्री तैयार करने का यह नवाचार कृषि अपशिष्ट प्रबंधन का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। साथ ही यह पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास तथा ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों को भी नई ऊर्जा प्रदान कर सकता है। मुख्य सचिव ने विश्वविद्यालय को आश्वस्त किया कि अनुसंधान कार्यों में वित्तीय संसाधनों की कमी नहीं आने दी जाएगी।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने उपलब्धि की जानकारी देते हुए बताया कि वैज्ञानिकों ने कृषि अवशेषों को उपयोगी बैटरी सामग्री में परिवर्तित करने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। इस तकनीक के माध्यम से कृषि अपशिष्ट का वैज्ञानिक एवं उपयोगी रूपांतरण संभव हो रहा है।
डॉ. प्रताप सिंह ने कहा कि इससे किसानों के लिए कृषि अवशेषों का बेहतर एवं आर्थिक रूप से लाभकारी उपयोग सुनिश्चित होगा, वहीं पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी। फसल अवशेषों को जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में भी यह तकनीक सहायक सिद्ध हो सकती है।
उन्होंने बताया कि यह नवाचार देश को आयातित संसाधनों पर निर्भरता कम करने तथा स्वदेशी तकनीकों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि इस तकनीक का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग किया जाता है तो बैटरी निर्माण में होने वाले आयात व्यय में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
इससे विदेशी मुद्रा की बचत के साथ-साथ देश की आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलेगी और कृषि, ऊर्जा एवं उन्नत प्रौद्योगिकी के बीच नई समन्वित संभावनाओं का विकास होगा।
विश्वविद्यालय के नवीकरणीय ऊर्जा अभियांत्रिकी विभाग ने विकसित तकनीक की प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि विशेष प्रक्रिया के माध्यम से कृषि अवशेषों को उच्च गुणवत्ता वाली उपयोगी सामग्री में परिवर्तित किया जाता है। यह तकनीक फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करती है।
कृषि अवशेषों के मूल्य संवर्धन के साथ विकसित यह तकनीक पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी प्रौद्योगिकी और ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
एमपीयूएटी का यह नवाचार कृषि अवशेष प्रबंधन, नवीकरणीय ऊर्जा और बैटरी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्वदेशी समाधान विकसित करने की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है। कृषि अवशेषों को समस्या के बजाय उपयोगी संसाधन में परिवर्तित करने वाली यह तकनीक किसानों की आय बढ़ाने, पर्यावरण संरक्षण तथा देश की ऊर्जा एवं तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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