मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ) के 19वें संस्करण में आयोजित ओपन फोरम चर्चा में फिल्म निर्माण और रचनात्मकता के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण विचार-विमर्श देखने को मिला। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि एआई रचनात्मकता का विकल्प नहीं, बल्कि उसे सशक्त बनाने वाला एक प्रभावी साधन है।

19वें मुम्बई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ) के दौरान इंडियन डॉक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन द्वारा “क्या एआई रचनात्मकता का भविष्य है?” विषय पर एक ओपन फोरम का आयोजन किया गया, जिसमें फिल्म निर्माण, कहानी कहने की कला और कंटेंट क्रिएशन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की गई।

इस परिचर्चा में फायरफ्लाई क्रिएटिव स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड के सह-संस्थापक सनत पीसी, सोसाइटी ऑफ मोशन पिक्चर एंड टेलीविजन इंजीनियर्स (एसएमपीटीई) के अध्यक्ष उज्ज्वल निर्गुडकर, अधिवक्ता हेतल देसाई सोलिया तथा फिल्मकार सुबोध मेनन (निर्देशक, फैनबॉय पिक्चर्स) ने हिस्सा लिया। सभी वक्ताओं ने फिल्म उद्योग में एआई के बढ़ते प्रभाव, अवसरों और चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।

चर्चा के दौरान रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र में एआई की बढ़ती भूमिका पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया। प्रतिभागियों ने माना कि एआई फिल्म निर्माण की प्रक्रियाओं को अधिक सुगम और प्रभावी बना सकता है, लेकिन कहानी कहने की मूल आत्मा आज भी मानव रचनात्मकता और भावनात्मक समझ में निहित है।

उज्ज्वल निर्गुडकर ने एआई को फिल्म निर्माण की अगली स्वाभाविक अवस्था बताते हुए पोस्ट-प्रोडक्शन में इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साउंड क्वालिटी, कलर करेक्शन, दृश्य सुधार और फिल्म रेस्टोरेशन जैसे क्षेत्रों में एआई तेजी से उपयोग में आ रहा है, हालांकि इसके मानकीकरण और व्यापक स्वीकार्यता में अभी समय लगेगा।

फिल्मकार सुबोध मेनन ने कहा कि एआई विचार निर्माण और कंटेंट जेनरेशन में सहायक हो सकता है, लेकिन वास्तविक कहानी कहने की प्रक्रिया मूल रूप से मानव आधारित ही रहती है। उन्होंने इसे एक ऐसे उपकरण के रूप में देखा जो रचनात्मक विचारों को दिशा देने और उन्हें परखने में मदद करता है।

फायरफ्लाई क्रिएटिव स्टूडियो के सह-संस्थापक सनत पीसी ने एआई को रचनात्मक प्रक्रिया को बेहतर बनाने वाला माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि यह तकनीक चित्र, ध्वनि और समग्र दर्शक अनुभव को बेहतर बना सकती है, लेकिन इसे केवल एक सहायक उपकरण के रूप में ही उपयोग किया जाना चाहिए, न कि पूर्ण विकल्प के रूप में।

वहीं, अधिवक्ता हेतल देसाई सोलिया ने एआई-जनित सामग्री से जुड़े कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए लाइसेंस प्राप्त डेटा के उपयोग और मानव भागीदारी की अनिवार्यता पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कॉपीराइट स्वामित्व मानव रचनाकारों के पास ही रहता है और एआई का उपयोग मौलिक रचनात्मकता के स्थान पर नहीं किया जाना चाहिए।

सत्र के समापन पर सभी विशेषज्ञों ने एकमत से कहा कि एआई को मानव रचनात्मकता के प्रतिस्थापन के रूप में नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली सहयोगी के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी माना कि एआई रचनात्मक प्रक्रियाओं को तेज और अधिक प्रभावी बना सकता है, लेकिन कहानी कहने का वास्तविक सार मानव कल्पना और भावनाओं में ही निहित रहेगा।

अंत में आयोजित संवाद सत्र में प्रतिभागियों ने एआई अपनाने, नैतिक चुनौतियों, कॉपीराइट संरक्षण और रचनात्मक उद्योग के भविष्य से जुड़े प्रश्नों पर भी विचार साझा किए। सत्र का समापन इस सहमति के साथ हुआ कि तकनीकी प्रगति को अपनाते हुए भी फिल्म निर्माण के केंद्र में मानव रचनात्मकता को बनाए रखना अनिवार्य है, क्योंकि वही सिनेमा की आत्मा है।

Pratahkal Bureau

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