एआई युग में सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा पर न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी का व्याख्यान
डॉ. भीमराव अम्बेडकर विधि विश्वविद्यालय के प्रथम स्मृति व्याख्यान में पूर्व न्यायाधीश ने डेटा उपयोग और संवैधानिक मूल्यों के अंतर्संबंधों पर विस्तृत चर्चा की।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर विधि विश्वविद्यालय, जयपुर के तत्वावधान में आयोजित प्रथम 'डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति विधि व्याख्यान' ने आधुनिक भारत में संवैधानिक मूल्यों और उभरती तकनीक के संगम पर एक नई विमर्श की धारा प्रवाहित की है। बाबा साहेब की 135वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित इस गरिमामय समारोह में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित माननीय न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी (अध्यक्ष, विधि आयोग एवं पूर्व न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय) ने "डाटा, डिग्निटी एंड डेस्टिनी: री-थिंकिंग सोशल जस्टिस इन द एआई ऐरा" विषय पर अपने प्रखर विचार साझा किए। राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुए इस बौद्धिक समागम में विश्वविद्यालय की कुलगुरू प्रो. (डॉ.) निष्ठा जसवाल एवं कुलसचिव श्री वीरेन्द्र कुमार वर्मा ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कानोडिया स्कूल लॉ फॉर वीमन को इस भव्य आयोजन की मेजबानी का दायित्व सौंपा गया, जिसमें प्रदेश के सभी 80 विधि महाविद्यालयों ने सक्रिय भागीदारी निभाते हुए कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाया।
कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए कुलगुरू प्रो. (डॉ.) निष्ठा जसवाल ने स्वागत उद्बोधन में डॉ. अम्बेडकर के जीवन दर्शन और उनकी अमिट विरासत पर प्रकाश डाला। उन्होंने मानवीय गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए भारतीय संविधान को आधुनिक समय की एक जीवंत हकीकत बताया और विद्यार्थियों को इसे पूर्णतः आत्मसात करने हेतु प्रेरित किया। इसी क्रम में न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. अम्बेडकर के अप्रतिम योगदान का स्मरण करते हुए वर्तमान दौर में निर्णय प्रक्रिया के भीतर डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि गरिमा हमारे संविधान की वह आत्मा है, जिसके साथ किसी भी परिस्थिति में समझौता संभव नहीं है। शिक्षा को महज आजीविका का साधन न मानकर उसे मुक्ति के एक सशक्त उपकरण के रूप में देखने के उनके आह्वान ने उपस्थित जनसमूह को गहराई से प्रभावित किया।
मुख्य वक्ता न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी ने अपने व्याख्यान में सामाजिक न्याय की परिभाषा को समय और धर्म के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करते हुए कहा कि गरिमा को सुनिश्चित करना इन दोनों कारकों पर निर्भर करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारा भविष्य इस बात पर टिका है कि आज हम डेटा का उपयोग किस प्रकार करते हैं। संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल्यों को केंद्र में रखते हुए उन्होंने प्रतिपादित किया कि सामाजिक न्याय कोई अंतिम परिणाम नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली वह प्रक्रिया है जो समाज में गरिमा को पुनस्र्थापित करती है। न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने चेतावनी दी कि सामाजिक लोकतंत्र की नींव के बिना राजनीतिक लोकतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है, क्योंकि गरिमा के अभाव में स्वतंत्रता सदैव अधूरी रहती है। उन्होंने भारतीयों की प्रामाणिक बुद्धिमत्ता (एथेंटिक इंटेलिजेंस) को तकनीक से ऊपर रखते हुए इसे राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम के समापन पर कुलसचिव वीरेन्द्र कुमार वर्मा ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की सफलता की पुष्टि की।

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