जयपुर में 15 जुलाई को सिंधी समाज का जेठ चंड पर्व जल संरक्षण, पर्यावरण बचाने और बेटी सम्मान के संदेश के साथ मनाया जाएगा। जानिए इसकी खास परंपराएं।

सिंधी समाज का प्रमुख लोकपर्व जेठ चंड बुधवार 15 जुलाई को धार्मिक आस्था के साथ जल संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और बेटी सम्मान का संदेश लेकर मनाया जाएगा। समाज के विभिन्न मंदिरों, सार्वजनिक जलाशयों और घरों में वरुणावतार भगवान झूलेलाल की पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि और विश्व कल्याण की कामना की जाएगी।

समाज के तुलसी संगतानी ने बताया कि जेठ चंड की पूजा सिंधी ज्येष्ठ मास के समापन पर की जाती है, जबकि कई घरों में अमावस्या पर भी इसका आयोजन होता है। उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जल और प्रकृति के संरक्षण का संदेश देने वाला सांस्कृतिक उत्सव भी है। जल ही जीवन का आधार है और जल स्रोतों की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक दायित्व है।

उन्होंने बताया कि इस पर्व पर महिलाएं पूजा के दौरान आटे के मोदक में पेड़ की टहनी स्थापित कर भगवान झूलेलाल का पूजन करेंगी। यह परंपरा प्रकृति, जल और हरियाली के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक मानी जाती है। जेठ चंड के अवसर पर घरों में पारंपरिक सिंधी व्यंजन पुलाव, मीठी सेवइयां और छोले तैयार किए जाएंगे तथा ऋतु फल आम, जामुन, खरबूजा और आलूबुखारा भगवान झूलेलाल को भोग के रूप में अर्पित किए जाएंगे।

मंदिरों में भजन-कीर्तन, आरती और विशेष पूजा के साथ श्रद्धालु जल, पर्यावरण और मानवता की रक्षा का संकल्प लेंगे। बच्चों को वृक्षों के महत्व, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन की जानकारी दी जाएगी, ताकि उनमें बचपन से ही प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो सके।

समय के साथ जेठ चंड की परंपराओं में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। पहले परिवार में पुत्र होने पर उसे विशेष महत्व दिया जाता था, लेकिन अब समाज बेटियों के उज्ज्वल भविष्य, सुख, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी समान श्रद्धा और उत्साह के साथ यह पर्व मना रहा है। इसे समाज में बढ़ती समानता और बदलती सकारात्मक सोच का प्रतीक माना जा रहा है।

समाजसेवी मोहन नानकानी ने कहा कि वर्तमान समय में जब जल संकट और पर्यावरण प्रदूषण जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं, तब भगवान झूलेलाल का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। उनके अनुसार जेठ चंड का पर्व लोगों को नदियों, तालाबों और जलाशयों को स्वच्छ रखने, अधिक से अधिक वृक्ष लगाने तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि यह त्योहार प्रकृति को बचाने, वृक्षों की सेवा करने और मौसमी फलों का अधिक से अधिक सेवन कर शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखने का संदेश भी देता है।

Pratahkal Bureau

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