जयपुर। आधुनिक शिक्षा प्रणाली में केवल किताबी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि हर श्रेणी के विद्यार्थी को समान अवसर और संवेदनशीलता प्रदान करना अनिवार्य है। इसी उद्देश्य के साथ जयपुर के तिलक नगर स्थित एमपीएस इंटरनेशनल स्कूल में 'समावेशी शिक्षा' (इन्क्लूसिव एजुकेशन) विषय पर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। रोटरी क्लब के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला में 'सपोर्ट फाउंडेशन फॉर ऑटिज्म एंड डेवलपमेंट डिसेबिलिटी' संस्था के विशेषज्ञों ने शिक्षकों को विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों (CWSN) की मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक जरूरतों को समझने के गुर सिखाए। कार्यक्रम का आगाज समावेशी समाज की परिकल्पना के साथ हुआ, जहां मुख्य वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि एक शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह विशेष बच्चों के जीवन में बदलाव का सबसे बड़ा संवाहक है।

कार्यशाला के दौरान रोटरी क्लब की प्रेसिडेंट नीता माथुर और मुख्य वक्ता प्रतिभा भटनागर, नवनीता नहाटा एवं निधि शर्मा ने शिक्षकों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। विशेषज्ञों ने बताया कि समावेशी शिक्षा का अर्थ केवल कक्षा में स्थान देना नहीं, बल्कि शिक्षण पद्धति में ऐसे बदलाव लाना है जिससे ऑटिज्म और अन्य विकास संबंधी अक्षमताओं से जूझ रहे बच्चे खुद को सहज महसूस कर सकें। विद्यालय के सचिव राधामोहन कचोलिया और भवन मंत्री गोविंद मालपानी ने कार्यशाला की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस प्रशिक्षण का मुख्य ध्येय विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के लिए विद्यालय परिसर में एक 'कंफर्टेबल' और 'हेल्दी एनवायरनमेंट' तैयार करना है। उन्होंने शिक्षण संस्थानों में बुनियादी ढांचे और मानवीय दृष्टिकोण के समन्वय को आज की सबसे बड़ी जरूरत बताया।

इस प्रशिक्षण सत्र के कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर चर्चा करते हुए सीबीएसई द्वारा जारी की गई नई गाइडलाइन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण किया गया। वक्ताओं ने विभिन्न अधिनियमों, शिक्षण गतिविधियों और आधुनिक 'एप्स' की जानकारी साझा की, जो शिक्षण प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बना सकते हैं। प्राचार्या मंजू शर्मा ने कार्यशाला के समापन पर शिक्षकों के अपग्रेडेशन की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि विद्यालय प्रबंधन विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है। उन्होंने विश्वास जताया कि ऐसे कार्यक्रमों से न केवल शिक्षकों के कौशल में वृद्धि होगी, बल्कि यह कदम एक न्यायसंगत और सहानुभूतिपूर्ण शैक्षणिक परिवेश की स्थापना में मील का पत्थर साबित होगा।

Pratahkal Bureau

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