पंचायती राज संस्थाओं के सशक्तिकरण पर मंथन: सप्तम राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने सुने महत्वपूर्ण सुझाव
जयपुर में राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी की अध्यक्षता में पंचायती राज संस्थाओं के सशक्तिकरण पर महत्वपूर्ण संवाद हुआ। जनप्रतिनिधियों ने वित्तीय आवंटन, विकास कार्यों और सुधारों पर कई अहम सुझाव दिए, जिन पर आयोग ने गंभीर विचार का आश्वासन दिया।

जयपुर के शासन सचिवालय में मंगलवार को सप्तम राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी (दाएं से दूसरे) पंचायती राज संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के साथ संवाद करते हुए।
जयपुर में मंगलवार को पंचायती राज संस्थाओं के वित्तीय सुदृढ़ीकरण और प्रशासनिक सुधारों को लेकर एक अहम संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता सप्तम राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष श्री अरुण चतुर्वेदी ने की। इस संवाद में पंचायती राज संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने भाग लेते हुए ग्रामीण विकास और वित्तीय प्रबंधन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए, जिन पर विस्तृत चर्चा की गई।
कार्यक्रम के दौरान जनप्रतिनिधियों ने सबसे प्रमुख रूप से यह मुद्दा उठाया कि राज्य वित्त आयोग द्वारा वर्तमान में वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर अनुदान का वितरण किया जा रहा है, जबकि प्रदेश की जनसंख्या में समय के साथ उल्लेखनीय परिवर्तन हो चुका है। ऐसे में उन्होंने सुझाव दिया कि वित्तीय आवंटन की प्रक्रिया को अद्यतन जनगणना के आंकड़ों के अनुरूप किया जाना चाहिए, ताकि संसाधनों का अधिक न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित हो सके।
अनुदान वितरण प्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। बैठक में सुझाव रखा गया कि राज्य वित्त आयोग के अनुदान की प्रथम किश्त में 80 प्रतिशत राशि जारी की जाए, जबकि शेष 20 प्रतिशत बाद में उपलब्ध कराई जाए, जिससे विकास कार्यों के क्रियान्वयन में वित्तीय बाधाएं उत्पन्न न हों और योजनाओं की गति बनी रहे।
संवाद के दौरान ग्रामीण स्तर पर बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए। जनप्रतिनिधियों ने ग्राम पंचायतों में सफाई व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पृथक सफाई कर्मियों की नियुक्ति की आवश्यकता जताई। साथ ही स्ट्रीट लाइट व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने के लिए सोलर ऊर्जा आधारित प्रणालियों को बढ़ावा देने पर बल दिया गया।
स्थानीय विकास कार्यों के संदर्भ में यह भी सुझाव दिया गया कि आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए प्राप्त अनुदान के साथ-साथ उसके रखरखाव और मरम्मत कार्यों के लिए भी अलग से वित्तीय प्रावधान होना चाहिए, ताकि परिसंपत्तियों की दीर्घकालिक उपयोगिता सुनिश्चित की जा सके।
इसके अलावा जनप्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि जिन क्षेत्रों में सड़क निर्माण कार्य संतृप्ति स्तर तक पहुंच चुके हैं, वहां इन मदों में आवंटित धनराशि को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अन्य विकास कार्यों में उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए। शिक्षा क्षेत्र को लेकर भी सुझाव सामने आया कि पूर्व में प्राथमिक विद्यालयों को दी जाने वाली सहायता व्यवस्था में बदलाव करते हुए अब माध्यमिक विद्यालयों को भी राज्य वित्त आयोग के अनुदान के दायरे में शामिल किया जाए।
ग्राम स्तर पर बढ़ते अतिक्रमण की समस्या पर चिंता जताते हुए एक प्रभावी प्रवर्तन एजेंसी के गठन का सुझाव भी दिया गया, जो जिला, पंचायत समिति और राज्य स्तर पर कार्य करते हुए सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। वहीं स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत ओडीएफ घोषित ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहन राशि दिए जाने की मांग भी प्रमुखता से रखी गई, ताकि स्वच्छता के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली पंचायतों को प्रोत्साहित किया जा सके।
इस अवसर पर मीडिया से बातचीत करते हुए आयोग के अध्यक्ष श्री अरुण चतुर्वेदी ने कहा कि जनप्रतिनिधियों द्वारा दिए गए सुझाव जमीनी अनुभवों पर आधारित हैं और राज्य वित्त आयोग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि सभी सुझावों का गंभीरता से परीक्षण किया जाएगा और उन्हें आयोग की अनुशंसाओं में शामिल करने पर विचार किया जाएगा, जिससे पंचायती राज संस्थाओं को अधिक सशक्त और प्रभावी बनाया जा सके।
कार्यक्रम में राज्य वित्त आयोग के सदस्य सचिव श्री नरेश कुमार ठकराल ने आयोग के कार्यों और दायित्वों की जानकारी दी, जबकि पंचायती राज विभाग के शासन सचिव एवं आयुक्त डॉ. जोगाराम ने स्वागत उद्बोधन में आयोग की भूमिका और पंचायती राज संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण में इसके महत्व को रेखांकित किया। इस संवाद में विभागीय अधिकारी, विभिन्न पंचायतों के जनप्रतिनिधि तथा संबंधित अधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। पूरा कार्यक्रम ग्रामीण शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।

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