जयपुर, 17 मई 2026: पावन, पवित्र और दिव्य अधिक मास के अत्यंत शुभ अवसर पर श्री भाटिया बिरादरी प्रबंध समिति, राजापार्क, जयपुर द्वारा आदर्श नगर स्थित भाटिया भवन में एक भव्य धार्मिक अनुष्ठान का शंखनाद किया गया है। यहाँ 16 मई से 24 मई तक चलने वाले नौ दिवसीय '108 श्री मद भागवत कथा' ज्ञान यज्ञ का अत्यंत श्रद्धापूर्वक एवं भव्य आयोजन किया जा रहा है। इस ऐतिहासिक धार्मिक समागम के भव्य शुभारंभ के तहत शनिवार को भव्य कलश यात्रा का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में मातृशक्ति और श्रद्धालु सम्मिलित हुए।

समिति के अध्यक्ष अजय गाँधी ने कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि शनिवार को धूमधाम से निकाली गई कलश यात्रा के बाद श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस का शुभारंभ हुआ। कथा के प्रथम दिन व्यासपीठ पर विराजमान गोकुल के प्रख्यात आचार्य श्री सुरेश जी शास्त्री के द्वारा श्रीमद् भागवत महात्म्य, प्रथम स्कन्ध, अधिकार लीला, कुंती स्तुति एवं भीष्म स्तुति का अत्यंत भावपूर्ण, मार्मिक और जीवंत वर्णन किया गया। कथा के दिव्य प्रारंभ से पूर्व मुख्य यजमानों एवं समिति के पदाधिकारियों द्वारा भगवान वेदव्यास, श्री शुकदेव जी एवं भगवान श्रीकृष्ण का सविधि पूजन-अर्चन कर कथा को गति दी गई। इसके पश्चात पूरा पंडाल श्रद्धालुओं द्वारा लगाए गए “हरे कृष्ण” एवं “राधे-राधे” के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठा और समूचा वातावरण पूरी तरह भक्ति के रंग में सराबोर हो गया।

व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए श्री सुरेश शास्त्री जी ने श्रीमद् भागवत महापुराण के अलौकिक महात्म्य का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने ज्ञानगंगा प्रवाहित करते हुए कहा कि घोर कलियुग में भगवान की प्राप्ति और मोक्ष का सबसे सरल तथा सुलभ माध्यम श्रीमद् भागवत कथा का निरंतर श्रवण ही है। भागवत केवल शब्दों का कोई सामान्य ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह स्वयं साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का वांग्मय स्वरूप है। शास्त्री जी ने बल देकर कहा कि जिस भी पवित्र स्थान पर भागवत कथा का वाचन और श्रवण होता है, वहां साक्षात समस्त देवी-देवताओं का स्थायी वास हो जाता है और वहां का संपूर्ण वातावरण पूरी तरह पवित्र एवं सकारात्मक हो जाता है। इस दिव्य कथा के श्रवण मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संचित पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं तथा मानव जीवन में परम भक्ति, परम ज्ञान और वैराग्य का नया संचार होता है।

कथा व्यास ने प्रथम स्कन्ध की दिव्य कथा का तार्किक विवेचन करते हुए श्रद्धालुओं को बताया कि महाभारत का विनाशकारी युद्ध समाप्त होने के पश्चात धरती पर धर्म की पुनर्स्थापना के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों का पग-पग पर उचित मार्गदर्शन किया था। इसी कालगणना के दौरान जब अश्वत्थामा ने अत्यधिक क्रोधवश उत्तरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को समूल नष्ट करने हेतु महाविनाशकारी ब्रह्मशिरा अस्त्र चला दिया, तब परम कृपालु भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं सूक्ष्म रूप में गर्भ में प्रवेश कर बालक परीक्षित के प्राणों की रक्षा की थी। यही मुख्य कारण है कि राजा परीक्षित को संपूर्ण सृष्टि में भगवान का विशेष और अनन्य कृपापात्र बताया गया है।

अधिकार लीला का गूढ़ अध्यात्म समझाते हुए आचार्य श्री सुरेश जी शास्त्री ने कहा कि श्रीमद् भागवत को ध्यानपूर्वक सुनने और समझने का परम अधिकार केवल उसी दिव्य आत्मा को प्राप्त होता है जिसके अंतःकरण में अटूट श्रद्धा, अनन्य भक्ति और परम विनम्रता का वास होता है। बिना नारायण की अहैतुकी कृपा के भागवत के वास्तविक रस और आनंद की प्राप्ति कदापि संभव नहीं हो सकती। कथा के क्रम में आगे यह भी विस्तार से बताया गया कि राजा परीक्षित को जब तक्षक नाग के डसने से सात दिन बाद सुनिश्चित मृत्यु होने का कठोर श्राप मिला, तब उन्होंने बिना विचलित हुए अपने सभी सांसारिक मोह और राजसी वैभव का तत्काल परित्याग कर दिया। उन्होंने मोक्ष प्राप्ति हेतु पवित्र गंगा के पावन तट पर श्री शुकदेव जी महाराज की शरण ली और उनसे श्रीमद् भागवत कथा के निरंतर श्रवण का दृढ़ निर्णय लिया। इतिहास में इसी ऐतिहासिक घटना को भागवत श्रवण की महान और सनातन परंपरा का उद्गम व प्रारंभ माना जाता है।

इसके पश्चात कथा व्यास द्वारा कुंती स्तुति का अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया। माता कुंती ने द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत स्तुति करते हुए नारायण से यह अनोखा वरदान मांगा था कि उनके जीवन में विपत्तियां और संकट बार-बार आएं, क्योंकि घोर संकट के समय ही सच्चे मन से भगवान के साक्षात दर्शन और उनका निरंतर स्मरण संभव होता है। माता कुंती ने भगवान को संपूर्ण जगत का एकमात्र पालनहार, नियंता एवं संकटग्रस्त भक्तों का सच्चा रक्षक बताया। कुंती जी की इस पराभक्ति, अटूट समर्पण और नारायण के प्रति उनके अगाध विश्वास के इस अलौकिक प्रसंग को सुनकर पंडाल में उपस्थित सभी श्रद्धालु पूरी तरह भावविभोर हो गए।

कथा के अंतिम चरण में भीष्म स्तुति का अत्यंत मर्मस्पर्शी वर्णन हुआ। जब पितामह भीष्म महाभारत युद्ध के बाद बाणों की शय्या (शरशैया) पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके अंतिम दर्शन हेतु उनके सम्मुख साक्षात प्रकट हुए थे। भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण के उस परम दिव्य चतुर्भुज स्वरूप का अपनी बंद आंखों में ध्यान करते हुए उनकी अत्यंत सुंदर स्तुति की। भीष्म जी ने संदेश दिया कि मानव के जीवन का अंतिम क्षण केवल और केवल भगवान के नाम स्मरण और उनके ध्यान में ही व्यतीत होना चाहिए। उन्होंने संपूर्ण जगत को धर्म, सत्य और अनन्य भक्ति का अमर संदेश देते हुए पूर्ण संतुष्टि के साथ भगवान के श्रीचरणों में अपने प्राणों को सदैव के लिए समर्पित कर दिया।

प्रथम दिवस की इस भव्य कथा के दौरान पूरा भाटिया भवन परिसर और राजापार्क क्षेत्र पूर्णतः भक्तिमय और दिव्य बना रहा। सुंदर भजनों की धुनों पर श्रद्धालुओं ने मंत्रमुग्ध होकर भावपूर्ण नृत्य किया तथा कथा के समापन पर महाआरती उतारी गई एवं उपस्थित सभी भक्तों में प्रसादी का वितरण किया गया। कार्यक्रम के सुचारू संचालन में जुटे श्री भाटिया बिरादरी प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष नितिन भाटिया (मोबाइल नंबर: 93514 33000) ने आगामी कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि सोमवार को आयोजित होने वाली अगले दिन की कथा के अंतर्गत भगवान के वाराह अवतार चरित्र, दक्ष यज्ञ चरित्र और परम भक्त ध्रुव चरित्र की पावन कथा का विस्तार से वाचन किया जाएगा।

Pratahkal Newsroom

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