जयपुर में श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन आचार्य सुरेश शास्त्री ने किया नृसिंह अवतार का वर्णन
श्री भाटिया बिरादरी प्रबंध समिति द्वारा आयोजित धार्मिक अनुष्ठान में अजामिल उपाख्यान और भरत चरित्र प्रसंगों पर श्रद्धालुओं ने किया भगवान का गुणगान।

जयपुर के आदर्श नगर में श्री भाटिया बिरादरी प्रबंध समिति द्वारा आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते आचार्य सुरेश जी शास्त्री।
जयपुर, 19 मई 2026: साधना के मार्ग में किसी भी प्रकार की आसक्ति मनुष्य को परमात्मा से दूर कर सकती है, इसलिए निष्काम भक्ति ही ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र साधन है। यह उद्गार आदर्श नगर स्थित श्री भाटिया बिरादरी प्रबंध समिति द्वारा आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर व्यास पीठ से व्यक्त किए गए। श्री गोकुल धाम के आचार्य सुरेश जी शास्त्री ने कथा व्यास के रूप में भरत चरित्र, अजामिल उपाख्यान, चतुःश्लोकी भागवत एवं भगवान नृसिंह अवतार प्रसंगों का अत्यंत भावपूर्ण और आध्यात्मिक गहराई के साथ वर्णन किया। इस भक्तिमय वातावरण में श्रद्धालुओं ने मंत्रमुग्ध होकर भगवान के गुणगान का श्रवण किया।
कथा का प्रवाह बढ़ाते हुए आचार्य सुरेश जी शास्त्री ने भरत चरित्र का जीवंत चित्रण किया। उन्होंने बताया कि राजा भरत ने राजपाट का त्याग कर भगवान की भक्ति का मार्ग अपनाया था, किन्तु जीवन के अंतिम क्षणों में एक हिरण के प्रति मोह उत्पन्न होने के कारण उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़ा। इस मर्मस्पर्शी प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि आध्यात्मिक साधना के पथ पर किसी भी सांसारिक वस्तु या जीव के प्रति आसक्ति आत्मा को प्रभु से विमुख कर देती है। इसके उपरांत, अजामिल उपाख्यान के जरिए भगवान के नाम की असीम महिमा को रेखांकित किया गया। शास्त्री जी ने सरल शब्दों में प्रतिपादित किया कि आजीवन पापमय जीवन जीने के बावजूद मृत्यु के निकट क्षणों में केवल अपने पुत्र “नारायण” का नाम उच्चारण करने मात्र से अजामिल को ईश्वरीय कृपा और मोक्ष प्राप्त हुआ, जो यह सिद्ध करता है कि कलियुग में भगवान का नाम ही मानव जीवन का सबसे बड़ा सहारा है।
धार्मिक अनुष्ठान को वैचारिक दृढ़ता प्रदान करते हुए चतुःश्लोकी भागवत की व्याख्या की गई, जिसमें बताया गया कि इस सम्पूर्ण चर-अचर सृष्टि में केवल परमात्मा ही एकमात्र शाश्वत और परम सत्य हैं। यही श्रीमद्भागवत महापुराण का मूल आध्यात्मिक संदेश है। इस दौरान व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को निरंतर भक्ति, सत्संग एवं सत्कर्मों के मार्ग पर अग्रसर रहने की लोक-कल्याणकारी प्रेरणा दी गई।
कथा के मुख्य आकर्षण के रूप में जब भगवान नृसिंह अवतार का प्रसंग प्रारंभ हुआ, तो भक्त प्रह्लाद की अटूट निष्ठा और हिरण्यकशिपु के चरम अहंकार का सजीव वृत्तांत सामने आया। शास्त्री जी ने सिंह गर्जना करते हुए कहा कि भगवान अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी समय और किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। जैसे ही खंभा फाड़कर नृसिंह भगवान के अवतरण का मुख्य प्रसंग आया, वैसे ही पूरा कथा पंडाल “नृसिंह भगवान की जय” के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा और माहौल पूरी तरह भक्ति के चरम आनंद में डूब गया।
इस विशाल धार्मिक आयोजन के व्यवस्थापकीय और सामाजिक आयामों को स्पष्ट करते हुए प्रबंध समिति के अध्यक्ष अजय गाँधी ने आधिकारिक जानकारी दी कि समिति द्वारा जनकल्याण के उद्देश्य से भाटिया अस्पताल का सफल संचालन किया जाता है। इस चिकित्सालय में आमजन के लिए फिजियो थैरिपी, रक्त जांच एवं अन्य सभी प्रकार की आवश्यक चिकित्सकीय जांचें बेहद रियायती और कम दरों पर उपलब्ध कराई जाती हैं। संस्था के उपाध्यक्ष नितिन भाटिया ने कार्यक्रम की समय-सारणी साझा करते हुए बताया कि प्रतिदिन प्रातः 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक 108 ब्राह्मणों द्वारा श्रीमद्भागवत का मूल पाठ किया जा रहा है। इसके पश्चात, अपरान्ह 3.30 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक नियमित रूप से मुख्य कथा का वाचन होता है। उन्होंने घोषणा की कि आगामी शनिवार, 23 मई को इस भव्य कथा की पूर्णाहुति होगी।
समारोह के आध्यात्मिक अनुक्रम में कार्यकारिणी के प्रमुख सदस्यों राजेंद्र भाटिया, हरीश भाटिया, अशोक, योगराज, आशीष, रवि और विकास भाटिया ने व्यास पीठ एवं भगवान की आरती उतारकर आशीर्वाद प्राप्त किया। उपाध्यक्ष नितिन भाटिया ने आगामी रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि बुधवार को कथा के चतुर्थ दिवस पर वामन अवतार, राम जन्म, कृष्ण जन्म और भव्य नंदमहोत्सव का श्रद्धापूर्वक गुणगान किया जाएगा। यह धार्मिक समागम जयपुर के मानस पटल पर भक्ति की अमिट छाप छोड़ रहा है।

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