राजस्थान की राजधानी जयपुर के राजापार्क स्थित श्री कृष्ण परनामी मंदिर का तीन दिवसीय भव्य स्थापना दिवस समारोह बैसाखी पर्व के पावन अवसर पर अपार श्रद्धा, उल्लास और धार्मिक उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस त्रैदिवसीय आयोजन ने समूचे क्षेत्र को भक्ति के रंग में सराबोर कर दिया। कार्यक्रम का विधि विधान से शुभारंभ 12 अप्रैल को विशाल प्रभात फेरी और धर्म ध्वजा फहराने के साथ किया गया, जिसमें भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। इस आध्यात्मिक उत्सव के दौरान मंदिर परिसर में अखंड पारायण पूजन के साथ-साथ मानवता की सेवा के संकल्प स्वरूप विशाल रक्तदान शिविर का भी सफलतापूर्वक आयोजन किया गया।

समारोह के मुख्य आकर्षणों की जानकारी देते हुए पंचायत प्रधान विजय परनामी ने बताया कि उत्सव के दौरान आराध्य श्री राज श्यामा जी का चंदन, गुलाब और केवड़ा आदि सुंगधित द्रव्यों से भव्य अभिषेक किया गया। वहीं, निवर्तमान पार्षद स्वाति परनामी के कुशल निर्देशन में कलाकारों द्वारा हिंदुत्व के गौरव और मूल्यों पर आधारित एक अत्यंत प्रभावशाली नाटक की प्रस्तुति दी गई, जिसने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। मंदिर समिति के अध्यक्ष कमल परनामी ने परनामी संप्रदाय के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस संप्रदाय की स्थापना 17वीं शताब्दी में देवचंद्र जी महाराज द्वारा की गई थी, जिसका कालांतर में संत महामति प्राणनाथ जी ने व्यापक प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने रेखांकित किया कि यह संप्रदाय विश्व को प्रेम, एकता और अटूट मानवता का शाश्वत संदेश देता है और इसके समर्पित अनुयायी ‘परनामी’ कहलाते हैं।

धार्मिक विमर्श की कड़ी में सचिव हिमांशु तनेजा ने बताया कि समारोह के दौरान पवित्र ‘श्री मुखवाणी’ पर विशेष चर्चा सत्र का आयोजन हुआ। इस अवसर पर करनाल धाम से पधारे श्री श्री 108 जगत राज जी महाराज एवं दिल्ली से पधारी श्री श्री 108 परीम सखी महाराज ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि ‘मुखवाणी’ वास्तव में महामति प्राणनाथ जी के वे दिव्य उपदेश हैं जो ईश्वरीय ज्ञान के अक्षय स्रोत हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका मुख्य संकलन ‘कुलजम स्वरूप’ में निहित है, जिसे ‘तारतम सागर’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पवित्र वाणी आत्मा का परमात्मा से मिलन और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हुए प्रेम, सत्य, अहिंसा और निस्वार्थ मानव सेवा का संदेश जन-जन तक पहुँचाती है।

भक्ति संगीत की धारा प्रवाहित करते हुए महिला मंडल की तृप्ति भगत, रीटा चिलाना, निहारिका, पूजा परनामी, रीटा भगत और दीपा परनामी ने “श्याम सुंदर बांसुरी वाले...”, “राज रस बरस रहयो आज मोरे अंगना में...”, “पिया के नैन नूरानी...” और “सज रहे मेरे श्री राज आज देखो फूलों से...” जैसे कर्णप्रिय भजनों की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। धार्मिक अनुष्ठानों के पश्चात मध्यान्ह में विशाल भंडारे का आयोजन हुआ जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की। आयोजन की समस्त व्यवस्थाओं को अशोक भगत, ब्रजमोहन मदान, किशन सपड़ा, आकाश क्षेत्रपाल, महेश परनामी, राजेंद्र तनेजा और रचित परनामी सहित अन्य कार्यकर्ताओं ने सुव्यवस्थित ढंग से संभाला।

समारोह के समापन पर अशोक भगत ने विशिष्ट अतिथियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने श्री गलता पीठ के अवधेशानंद महाराज, श्री राम मंदिर आदर्श नगर के अनिल खुराना एवं रवि सचदेवा, भाटिया बिरादरी के अजय गांधी एवं नितिन भाटिया, श्री गंगा दास मंदिर के डॉ. महेश पोपली, तथा सिंधी समाज के प्रतिनिधि तुलसी संगतानी और मनोहर मनवानी का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया। यह वार्षिकोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज में एकता और सेवा भाव को सुदृढ़ करने में भी मील का पत्थर साबित हुआ।

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