जयपुर। राजस्थान कॉलेज में चल रहे राष्ट्रीय पुस्तक मेले के आठवें दिन “समाज और संस्कृति” विषय पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार प्रबोध कुमार गोविल उपस्थित रहे। उनके साथ लेखक नंद भारद्वाज, साहित्यकार साकार श्रीवास्तव 'फलक', लेखक बालकिशन सुथार और प्रोफेसर तारावती मीणा ने अपने विचार रखे।

संस्कृति और समाज का अन्योन्याश्रित संबंध

परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए प्रबोध कुमार गोविल ने कहा कि "समाज और संस्कृति का गहरा और अन्योन्याश्रित संबंध है। समाज से संस्कृति का निर्माण होता है और संस्कृति समाज को दिशा देती है।" उन्होंने राजस्थान की समृद्ध वाचिक परंपरा और यहां की भाषाई जड़ों को मजबूत बताते हुए कहा कि ये परंपराएं ही हमारी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखती हैं।

परंपराओं का संरक्षण और विकास

लेखक नंद भारद्वाज ने जयपुर के “गुलाबी शहर” बनने की कहानी को संस्कृति से जोड़ते हुए कहा कि "परंपराओं के संरक्षण और निरंतरता से ही संस्कृति का विकास संभव होता है।" कार्यक्रम के दौरान उपस्थित वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि सांस्कृतिक मूल्यों के बिना समाज का विकास अधूरा है।

लोक धरोहर और मानवीय प्रेरणा

राजस्थान विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर तारावती मीणा ने कहा कि "लोकवार्ताएं, लोककथाएं, कहावतें और लोकसंगीत समाज की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जो मनुष्य को बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।" उन्होंने स्पष्ट किया कि पुस्तक मेले जैसे आयोजन भी संस्कृति के विस्तार के माध्यम बनते हैं और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

समापन और आभार

इस सार्थक विमर्श में लेखक बालकिशन सुथार और साहित्यकार साकार श्रीवास्तव 'फलक' ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। कार्यक्रम के अंत में समय इंडिया के प्रबंध न्यासी चंद्र भूषण ने सभी अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया।

Pratahkal Bureau

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