जयपुर। राजस्थान की राजधानी जयपुर में चिकित्सा विज्ञान और मानवीय जिजीविषा की एक ऐसी मिसाल पेश की गई है, जिसने न केवल चिकित्सा जगत को हैरान कर दिया है, बल्कि कैंसर के खिलाफ जंग लड़ रहे हजारों मरीजों के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगाई है। जयपुर स्थित एचसीजी कैंसर सेंटर के अनुभवी सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. निखिल मेहता और उनकी टीम ने एक बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन को अंजाम देते हुए एक 49 वर्षीय महिला की जांघ से साढ़े आठ किलो वजन का विशालकाय ट्यूमर सफलतापूर्वक बाहर निकाला है। 40×40 सेंटीमीटर आकार का यह ट्यूमर अब तक रिपोर्ट किए गए जांघ के सबसे बड़े सॉफ्ट टिश्यू सरकोमा (लिपोसारकोमा) में से एक माना जा रहा है।

पिछले आठ वर्षों से यह महिला एक ऐसी पीड़ा को सह रही थी, जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाए। दाहिनी जांघ के अंदरूनी हिस्से यानी मेडियल कंपार्टमेंट में पनपा यह लिपोसारकोमा वक्त के साथ इतना विकराल हो गया कि महिला का सामान्य रूप से चलना-फिरना भी दूभर हो गया था। लगातार बढ़ते दर्द और शरीर पर लदे इस भारी वजन ने उन्हें बिस्तर पर ला दिया था। जब वे एचसीजी कैंसर सेंटर पहुंचीं, तो जांच में ट्यूमर की गंभीरता सामने आई। यह ट्यूमर न केवल आकार में विशाल था, बल्कि 'हाईली वैस्कुलर' होने के कारण इसमें रक्त का संचार बहुत अधिक था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि यह ट्यूमर शरीर की मुख्य रक्त वाहिकाओं और फेमोरल नसों के अत्यंत करीब था, जहां एक छोटी सी चूक मरीज की जान को जोखिम में डाल सकती थी या उनके पैर को हमेशा के लिए अपंग बना सकती थी।

इस जीवन रक्षक सर्जरी का जिम्मा डॉ. निखिल मेहता के नेतृत्व में डॉ. कपिल शर्मा, डॉ. ओ पी जाट और डॉ. मनोज बंसल की टीम ने संभाला। चिकित्सा टीम ने बेहद सूक्ष्म नियोजन और सटीकता के साथ एलिप्टिकल चीरा लगाकर इस विशालकाय ट्यूमर को शरीर से अलग करने की प्रक्रिया शुरू की। घंटों चली इस मैराथन सर्जरी के दौरान हर कदम पर सावधानी बरती गई ताकि नसों और रक्त वाहिकाओं को कोई नुकसान न पहुंचे। डॉक्टरों के कौशल और आधुनिक तकनीक के समन्वय का ही परिणाम था कि 8.5 किलोग्राम का यह 'मांस का पहाड़' सफलतापूर्वक निकाल लिया गया।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर एचसीजी कैंसर सेंटर, जयपुर के डायरेक्टर ऑन्कोलॉजी, डॉ. नरेश सोमानी ने संस्थान की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि ऐसे एडवांस सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा मरीज के जीवन की गुणवत्ता को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं, लेकिन अनुभवी डॉक्टरों और अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के मेल से ऐसे नामुमकिन दिखने वाले मामलों का सफल इलाज अब संभव है। डॉ. निखिल मेहता ने सर्जरी के बाद बताया कि लिपोसारकोमा एक दुर्लभ कैंसर है और इस केस में ट्यूमर का वजन ही सबसे बड़ी बाधा थी, जिसे सही प्लानिंग और टीमवर्क से पार कर लिया गया।

सर्जरी के बाद के परिणाम चमत्कारिक रहे। जो महिला वर्षों से कदम उठाने के लिए तरस रही थी, वह सर्जरी के महज तीन दिन बाद बिना किसी सहारे के अपने पैरों पर चलने लगी। अस्पताल से छुट्टी के समय मरीज और उनके परिजनों की आंखों में खुशी के आंसू इस सफल ऑपरेशन की सार्थकता को बयां कर रहे थे। यह मामला न केवल जयपुर के मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि यदि सही समय पर जांच और सही विशेषज्ञों का परामर्श मिले, तो कैंसर जैसे घातक रोग के बावजूद एक सामान्य और गरिमामय जीवन की ओर वापसी संभव है।

Pratahkal Bureau

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