जयपुर: जवाहर कला केंद्र में सुरों की स्वर्णिम वर्षा, 'अनहद' की सर्द शाम में अश्विनी भिड़े के गायन ने घोली गर्माहट
जयपुर के जवाहर कला केंद्र में 'अनहद' संगीत श्रृंखला के तहत डॉ. अश्विनी भिड़े-देशपांडे के शास्त्रीय गायन ने सर्द शाम को सुरों की गर्माहट से भर दिया। राजस्थान पर्यटन विभाग और स्पिक मैके द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में राग श्री और राग दुर्गा की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी के मार्गदर्शन में आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या का विस्तृत विवरण और मुख्य आकर्षण यहाँ पढ़ें।

जयपुर। गुलाबी नगरी की ठिठुरती शीत लहर के बीच जब संगीत के सुरों का संगम हुआ, तो पूरा वातावरण एक आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठा। शनिवार की शाम जवाहर कला केंद्र का खुला 'मध्यवर्ती' प्रांगण न केवल संगीत प्रेमियों से खचाखच भरा था, बल्कि वहां मौजूद हर व्यक्ति सुरों की उस तपिश को महसूस कर रहा था जिसने सर्दी के अहसास को गौण कर दिया। राजस्थान पर्यटन विभाग और स्पिक मैके के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘अनहद’ संगीत श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी ने शास्त्रीय गायन की एक ऐसी अमिट इबारत लिखी, जो जयपुर के सांस्कृतिक इतिहास में लंबे समय तक याद रखी जाएगी।
जैसे ही शाम का धुंधलका गहराया, मुंबई से पधारीं जयपुर-अतरोली घराने की प्रख्यात शास्त्रीय गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े-देशपांडे मंच पर विराजीं। ऊनी लिबासों में लिपटे दर्शकों के बीच राग 'श्री' के गंभीर स्वरों ने जैसे ही दस्तक दी, पूरा परिसर मौन की गहरी चादर में लिपट गया। डॉ. भिड़े ने जब विलंबित तीन ताल में अपनी बंदिश “कहां गुरु मैं ढूंढन जाऊं” का विस्तार शुरू किया, तो राग की स्पष्टता और उनके भावपूर्ण गायन ने वरिष्ठ रसिकों से लेकर युवा विद्यार्थियों तक, सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके पश्चात द्रुत तीन ताल में “ऐ री है तो आस न गई” की प्रस्तुति पर श्रोताओं की दाद और थिरकते सिरों ने यह प्रमाणित कर दिया कि शास्त्रीय संगीत की जड़ें आज भी जनमानस में कितनी गहरी हैं।
कार्यक्रम का आध्यात्मिक चरमोत्कर्ष तब आया जब डॉ. भिड़े ने राग 'दुर्गा' में बंदिश “माता कालिका” का सस्वर पाठ किया। उस क्षण जवाहर कला केंद्र का खुला प्रांगण किसी भव्य मंदिर के गर्भगृह सा प्रतीत होने लगा, जहां भक्ति और कला का अद्भुत मिलन हो रहा था। द्रुत तराने की तीव्र लयकारी और उस पर गूंजती तालियों की गड़गड़ाहट ने वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया। इस सांगीतिक यात्रा को हारमोनियम पर ध्यानेश्वर सोनावणे और तबले पर प्रणव गुरव की उत्कृष्ट संगत ने एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया। तबले की थाप और हारमोनियम की सुरीली लहरियां खुले आकाश के नीचे दूर तक प्रतिध्वनित होती रहीं।
सांस्कृतिक संवर्धन के इस महाकुंभ के पीछे एक दूरदर्शी सोच परिलक्षित होती है। उपमुख्यमंत्री एवं पर्यटन मंत्री दिया कुमारी के कुशल मार्गदर्शन में राजस्थान पर्यटन विभाग प्रदेश की विरासत और शास्त्रीय कलाओं को जन-सुलभ बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। 'अनहद' श्रृंखला इसी प्रयास का प्रतिफल है, जो हर दूसरे शनिवार को शास्त्रीय संगीत की मिठास को आम जनता तक पहुँचा रही है। इस गरिमामयी संध्या के साक्षी के रूप में पर्यटन विभाग की संयुक्त निदेशक डॉ. पुनीता सिंह, सहायक निदेशक हनुमान सहाय कुमावत, सहायक निदेशक हिमांशु मेहरा और लेखाधिकारी ताराचंद मंडीवाल सहित विभाग के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
रात के गहराते अंधेरे और सर्द हवाओं के बीच भी दर्शकों का अंत तक डटे रहना इस आयोजन की सफलता की सबसे बड़ी गवाही थी। सुरों की शुद्धता और भावों की सादगी से सजी यह शाम केवल एक प्रदर्शन मात्र नहीं थी, बल्कि यह राजस्थान की उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतिबिंब थी जो अपनी जड़ों को सींचने के लिए प्रतिबद्ध है। 'अनहद' की यह सुरमयी शाम जयपुर के मानस पटल पर संगीत की एक ऐसी सुखद गर्माहट छोड़ गई, जो अगली प्रस्तुति तक संगीत प्रेमियों के दिलों में जलती रहेगी।

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