जयपुर की लगभग तीन सदियों पुरानी विरासत को 2027 में एक नए अंदाज में प्रस्तुत करने की तैयारी है। गुलाबी शहर जब अपने 300वें वर्ष में प्रवेश करेगा, तब इसकी ऐतिहासिक गलियों, किलों, महलों, आंगनों और विशिष्ट वास्तुकला की कहानियों को प्रकाश, प्रोजेक्शन, ध्वनि और रोचक कहानी-वाचन के माध्यम से जीवंत अनुभव में बदलने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इस पहल का उद्देश्य आधुनिक डिजिटल तकनीक के जरिए नई पीढ़ी को जयपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है।

फ्लोटिंग कैनवस कंपनी (एफसीसी) इस दिशा में अपनी रचनात्मक क्षमताओं के जरिए जयपुर के अतीत और वर्तमान के बीच संबंध स्थापित करने वाले डिजिटल अनुभव पर काम कर रही है। कंपनी राजस्थान में ऐतिहासिक वास्तुकला और आधुनिक कहानी-वाचन के मेल पर पहले भी काम कर चुकी है। वर्ष 2025 में आयोजित पहले जोधपुर आर्ट्स वीक के दौरान एफसीसी ने खास बाग की ऐतिहासिक इमारत पर ‘अ शो ऑफ हैंड्स’ नामक प्रोजेक्शन मैपिंग शो प्रस्तुत किया था। इस प्रस्तुति में भारत के कारीगरों और शिल्पकारों के योगदान को सम्मान दिया गया था। इसमें हाथों को प्रमुख दृश्य माध्यम बनाकर सृजन, आश्चर्य और उत्कृष्ट कारीगरी की कहानी प्रस्तुत की गई थी।

जयपुर की 300वीं वर्षगांठ नजदीक आने के साथ एफसीसी शहर की वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत को इमर्सिव स्टोरीटेलिंग के माध्यम से प्रस्तुत करने की संभावनाएं तलाश रही है। इस तकनीक के जरिए ऐतिहासिक इमारतों की संरचना को बदले बिना उनकी कहानियों को प्रकाश, दृश्य प्रभावों और ध्वनि के माध्यम से दर्शकों के सामने लाने की योजना पर ध्यान दिया जा रहा है।

फ्लोटिंग कैनवस कंपनी के सह-संस्थापक और क्रिएटिव डायरेक्टर शक्ति स्वरूप साहू ने कहा, “जयपुर की अपनी एक अद्भुत दृश्य भाषा है, लेकिन यहां की वास्तुकला में भव्यता के अलावा भी बहुत कुछ है। हर इमारत के सामने के हिस्से, आंगन और स्मारक की अपनी एक कहानी है। तकनीक ने हमें यह मौका दिया है कि हम इन इमारतों की मूल संरचना को कोई नुकसान पहुंचाए बिना, उनकी कहानियों को जीवंत कर सकें।”

एफसीसी इससे पहले मुंबई की कई ऐतिहासिक इमारतों और स्थलों पर भी इसी तरह के अनुभव तैयार कर चुकी है। इनमें प्रसिद्ध अफगान चर्च, राजाबाई क्लॉक टॉवर और डेविड ससून लाइब्रेरी एंड रीडिंग रूम शामिल हैं। हाल ही में कंपनी ने एम.एफ. हुसैन की प्रसिद्ध ‘हॉर्सेस’ यानी घोड़ों वाली श्रृंखला को भी डिजिटल शो के माध्यम से जीवंत रूप में प्रस्तुत किया था।

कंपनी के सह-संस्थापक आगम मेहता ने प्रोजेक्शन मैपिंग के पीछे की सोच स्पष्ट करते हुए कहा, “हमारा मकसद सिर्फ इसलिए किसी ऐतिहासिक इमारत पर प्रोजेक्शन मैपिंग करना नहीं है कि हम ऐसा कर सकते हैं। बल्कि, इसका असली मकसद उस जगह से जुड़ी एक ऐसी कहानी खोजना है, जो उसी जगह की हो और फिर उस इमारत को ही उस कहानी को सुनाने का हिस्सा बनाना है।”

जयपुर के 300वें वर्ष के अवसर पर प्रस्तावित यह पहल ऐतिहासिक वास्तुकला को केवल देखने योग्य धरोहर के बजाय कहानी सुनाने वाले माध्यम के रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में एक प्रयास है। एफसीसी का जोर ऐसी कहानियों को सामने लाने पर है, जो संबंधित ऐतिहासिक स्थल से जुड़ी हों और आधुनिक तकनीक के माध्यम से उसकी विरासत को नए दृष्टिकोण से अनुभव करने का अवसर दें।

Next Story