भारतीय रेलवे ने अपनी कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए 'हमारी शक्ति, हमारा ग्रह' की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में एक मौन क्रांति का नेतृत्व किया है। सतत विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए रेलवे ने वर्ष 2025-26 के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में 81 लाख 59 हजार पेड़ लगाकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। रेलवे पटरियों के किनारे किए गए इस व्यापक वृक्षारोपण से न केवल मृदा अपरदन को प्रभावी ढंग से रोका जा रहा है, बल्कि यह यात्रियों के अनुभव को अधिक हरित, सुरक्षित और सुखद बना रहा है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मजबूती से बांधकर विशेष रूप से पहाड़ी और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भूस्खलन के खतरे को कम कर बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही हैं। यह वनस्पति आवरण सतही अपवाह को नियंत्रित कर जल अवशोषक के रूप में कार्य करता है, जिससे रेल मार्गों पर सूक्ष्म जलवायु परिस्थितियों में सुधार हुआ है।

जल संरक्षण के क्षेत्र में रेलवे ने संचयन, पुनर्चक्रण, लेखापरीक्षा और पुनर्स्थापन का एक चहुंमुखी दृष्टिकोण अपनाया है। वर्ष 2016-17 से अब तक कुल 8,313 छतों पर वर्षा जल संचयन (आरडब्ल्यूएच) संरचनाएं स्थापित की जा चुकी हैं, जिनमें अकेले पिछले दो वर्षों में 2,915 नई इकाइयां चालू हुईं। विशेष रूप से वर्ष 2024-25 में 'जल संचय जन भागीदारी' (जेएसजेबी) अभियान के तहत 1,215 इकाइयां स्थापित की गईं। राजस्थान के जल संकटग्रस्त क्षेत्रों और दक्कन के वर्षा-छाया क्षेत्रों के लिए ये प्रणालियाँ जीवन रेखा साबित हो रही हैं, जो स्टेशनों पर जलभराव रोककर भूमिगत जलभंडारों को पुनर्भरण प्रदान कर रही हैं। इसके अतिरिक्त, रेलवे ने अब तक कुल 185 जल पुनर्चक्रण संयंत्र (डब्ल्यूआरपी) स्थापित किए हैं, जिनमें पिछले वित्तीय वर्ष में रिकॉर्ड 26 नए संयंत्र शुरू किए गए। उत्तरी रेलवे 27 संयंत्रों के साथ इस सूची में शीर्ष पर है। चेन्नई के 2019 के जल संकट के दौरान बेसिन ब्रिज और एग्मोर के संयंत्रों ने परिचालन लचीलेपन का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया था।

स्वच्छता और ऊर्जा दक्षता के मोर्चे पर भी अभूतपूर्व कार्य हुआ है। वर्ष 2014 से अब तक 3.66 लाख बायो-टॉयलेट स्थापित किए गए हैं, जिन्होंने पटरियों पर मानव मल के सीधे विसर्जन को समाप्त कर मिट्टी और भूजल की सुरक्षा सुनिश्चित की है। ऊर्जा के क्षेत्र में, भारतीय रेलवे ने अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क का 99.6 प्रतिशत विद्युतीकरण पूर्ण कर लिया है, जिससे मार्च 2026 तक 69,873 रूट किलोमीटर विद्युतीकृत हो चुके हैं। इस कदम से वर्ष 2024-25 में डीजल की खपत में 178 करोड़ लीटर की भारी कमी आई है, जो पश्चिम एशिया संकट के बीच तेल आयात पर निर्भरता को न्यूनतम करती है। साथ ही, 909 मेगावाट सौर और 103 मेगावाट पवन ऊर्जा परियोजनाएं चालू हो चुकी हैं, जबकि 3,300 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता के लिए समझौते किए गए हैं। अहमदाबाद का कांकरिया कोचिंग डिपो भारत का पहला जल-तटस्थ रेलवे डिपो बनकर उभरा है, जो शून्य बाहरी जल निर्भरता के साथ काम कर रहा है।

रेलवे ने अपनी 100 प्रतिशत संपत्तियों में एलईडी प्रकाश व्यवस्था लागू कर दी है और वर्ष 2025 में तीन श्रेणियों में सात राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार जीतकर अपनी प्रतिबद्धता को प्रमाणित किया है। 1,944 जल लेखापरीक्षाओं और रेलवे भूमि पर 109 जलाशयों व आर्द्रभूमियों के जीर्णोद्धार के माध्यम से स्थानीय जैव विविधता को भी नया जीवन मिला है। भारतीय रेलवे का यह एकीकृत प्रयास न केवल पर्यावरण संरक्षण की एक मिसाल है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक आत्मनिर्भर, टिकाऊ और हरित परिवहन तंत्र के निर्माण की ठोस आधारशिला भी है।

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