राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने जयपुर में भगवान परशुराम की आरती और पूजा-अर्चना की
राजस्थान के राज्यपाल ने अक्षय तृतीया पर बिड़ला सभागार में आयोजित प्रदेश स्तरीय समारोह में भाग लिया और वैदिक संस्कृति के संरक्षण का आह्वान किया।

जयपुर के बिड़ला सभागार में अक्षय तृतीया और भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में भगवान की आरती करते राजस्थान के राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागड़े।
जयपुर। राजस्थान के राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने रविवार को जयपुर स्थित बिड़ला सभागार में अक्षय तृतीया और भगवान परशुराम जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित प्रदेश स्तरीय समारोह में सम्मिलित होकर भगवान परशुराम की विधिवत पूजा-अर्चना और आरती की। इस पावन अवसर पर राज्यपाल ने भगवान परशुराम की छवि पर पुष्प अर्पित कर प्रदेशवासियों की सुख, समृद्धि और संपन्नता के लिए मंगल कामना की। लोकभवन सचिवालय द्वारा जारी सूचना के अनुसार, राज्यपाल ने भगवान परशुराम को शस्त्र और शास्त्र का मर्मज्ञ बताते हुए उन्हें अन्याय एवं अनाचार का प्रतिरोध करने वाला महान ऋषि निरुपित किया।
समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने भगवान परशुराम के जीवन प्रसंगों पर प्रकाश डाला और कहा कि उनका व्यक्तित्व मात्र ज्ञान तक सीमित नहीं था, बल्कि वे जीवन में आदर्शों की स्थापना हेतु अधर्म के विरुद्ध खड़े होने वाले प्रेरक पुंज हैं। उन्होंने अक्षय तृतीया के महत्व को बौद्धिक क्षमताओं के विकास से जोड़ते हुए बताया कि इसी पवित्र तिथि पर वेद व्यासजी ने विघ्नहर्ता गणेश को महाभारत लेखन के लिए तैयार किया था। राज्यपाल ने स्पष्ट किया कि परशुराम जयंती केवल स्मरण का दिवस नहीं है, अपितु यह उनके त्याग, तप, शौर्य और धर्म रक्षा के संकल्प को आत्मसात करने का पर्व है।
ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों को साझा करते हुए श्री बागडे ने कहा कि जब पृथ्वी पर दुष्ट शक्तियों और अधर्म का प्रभाव बढ़ा, तब भगवान परशुराम ने विनाश के लिए अवतार लिया। उनके हाथ में सुशोभित 'परशु' उनकी वीरता और पराक्रम का प्रतीक है। उन्होंने भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों को शस्त्र विद्या प्रदान की थी। राज्यपाल ने बताया कि उनका मूल नाम 'राम' था, किंतु आराध्य भगवान शिव द्वारा प्रदत्त 'परशु' धारण करने के कारण वे परशुराम कहलाए। कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने भगवान परशुराम पर आधारित एक लघु फिल्म का अवलोकन भी किया और उपस्थित जनसमूह से वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु उनके कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाने का आह्वान किया। यह आयोजन समाज में निर्भीकता और धार्मिक मूल्यों के संरक्षण का एक सशक्त संदेश दे गया।

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