राज्यपाल ने महाराणा प्रताप जयंती पर वीरता और इतिहास की गौरवगाथा का किया स्मरण, क्षत्रिय समाज की प्रतिभाओं का हुआ सम्मान
जयपुर के लोकभवन में महाराणा प्रताप जयंती पर राज्यपाल ने वीरता, इतिहास और भारतीय परंपरा पर प्रेरक संबोधन दिया। क्षत्रिय समाज की प्रतिभाओं के सम्मान समारोह में दिए गए उनके वक्तव्य ने इतिहास के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों को फिर से जीवंत किया।

जयपुर के लोकभवन में बुधवार को आयोजित महाराणा प्रताप जयंती सम्मान समारोह के दौरान मंच से क्षत्रिय समाज की प्रतिभाओं और उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे।
जयपुर में लोकभवन बुधवार को उस समय ऐतिहासिक और भावनात्मक क्षणों का साक्षी बना जब महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर आयोजित सम्मान समारोह में राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने क्षत्रिय समाज की प्रतिभाओं को सम्मानित किया और भारतीय इतिहास के वीर नायकों की गौरवगाथा का विस्तार से उल्लेख किया। भारतीय क्षत्रिय महासंघ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यपाल ने अपने संबोधन में महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य, साहस और राष्ट्रभक्ति को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि दोनों महान योद्धा एक ही काल में होते तो भारत का इतिहास कुछ और होता।
समारोह में संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि महाराणा प्रताप ने मुगल आक्रांताओं के विरुद्ध अपनी वीरता और अदम्य साहस से इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने हल्दीघाटी युद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि इस संघर्ष में महाराणा प्रताप ने मुगल सेना को हतोत्साहित किया। इसके बाद सुनियोजित रणनीति के तहत दिवेर के युद्ध में अकबर की सेना को आत्मसमर्पण के लिए बाध्य होना पड़ा। राज्यपाल ने कहा कि महाराणा प्रताप को देश का ऐसा पहला स्वाधीनता सेनानी माना जा सकता है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष किया और अपार साहस का परिचय दिया।
राज्यपाल ने यह भी कहा कि अकबर ने स्वयं महाराणा प्रताप से सीधे युद्ध नहीं किया, बल्कि राजा मानसिंह को युद्ध के लिए भेजा था। उन्होंने बताया कि उस समय महाराणा प्रताप की सेना लगभग बीस हजार थी, जबकि मुगल सेना की संख्या लगभग एक लाख के आसपास थी, फिर भी महाराणा प्रताप ने साहस और रणनीति के बल पर मुगल सेना को चुनौती दी।
अपने संबोधन में श्री बागडे ने मेवाड़ की गौरवशाली परंपरा का उल्लेख करते हुए इसे भक्ति और शक्ति की भूमि बताया। उन्होंने बप्पा रावल का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने अरब आक्रांताओं को भारत से खदेड़ दिया था, जिसके बाद लंबे समय तक बाहरी आक्रमणकारियों की ओर से कोई चुनौती नहीं आई। साथ ही उन्होंने महाराणा सांगा और पन्ना धाय जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के वास्तविक इतिहास से नई पीढ़ी को अवगत कराना आवश्यक है।
राज्यपाल ने नई शिक्षा नीति के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने और बच्चों की बौद्धिक क्षमता के विकास पर बल दिया। उन्होंने महाराणा प्रताप को नैतिक मूल्यों और स्त्री अस्मिता के सम्मान का प्रतीक बताते हुए एक प्रसंग का उल्लेख किया, जिसमें उनके पुत्र अमरसिंह द्वारा बंदी बनाई गई महिलाओं को महाराणा प्रताप के हस्तक्षेप के बाद सम्मानपूर्वक वापस भेजा गया था।
उन्होंने यह भी कहा कि महाराणा प्रताप की सेना में केवल राजपूत ही नहीं, बल्कि भील जनजाति, जाट और अन्य समुदायों के योद्धा भी शामिल थे, जिनमें भील सरदार राणा पूंजा उनकी सेना के प्रमुख स्तंभ रहे। राज्यपाल ने कहा कि महाराणा प्रताप जयंती हमें उनके आदर्शों पर चलकर अन्याय और अनैतिकता के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देती है।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि महाराणा प्रताप का जीवन आज भी राष्ट्रभक्ति, साहस और स्वाभिमान की प्रेरणा का अमिट स्रोत बना हुआ है।

Pratahkal Bureau
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