जयपुर, 4 जनवरी 2026

गुलाबी नगरी जयपुर के जवाहर नगर स्थित श्री झूलेलाल मंदिर के प्रांगण में रविवार को सिंधी साहित्य और संवेदनाओं का एक अनूठा संगम देखने को मिला। सिंधी सेंट्रल एसोसिएशन और राजस्थान सिंधी अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राज्य स्तरीय सिंधी कवि सम्मेलन 'लफ्ज़नि जो मेलो' ने न केवल सिंधी भाषा की मिठास घोली, बल्कि अपनी ओजस्वी रचनाओं से उपस्थित जनसमूह में देशभक्ति और सामाजिक चेतना का नया संचार कर दिया। कार्यक्रम का आगाज़ श्री अमरापुर के पूज्य संत श्री मोनू राम जी साहिब और श्री मुकेश साध द्वारा दीप प्रज्जवलन के साथ हुआ, जिसके बाद समूचा वातावरण सिंधी साहित्य की सुगंध से महक उठा।

साहित्यिक संवाद को विस्तार देते हुए एसोसिएशन के अध्यक्ष रतन ऐलानी और अकादमी सचिव डॉ. रजनीश हर्ष ने आयोजन की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस मंच के माध्यम से सिंधी कवियों ने सामाजिक सरोकार, सिंधी संस्कृति, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य और भक्ति रस की ऐसी त्रिवेणी प्रवाहित की, जिसने श्रोताओं को अपनी जड़ों से जुड़ने पर विवश कर दिया। कार्यक्रम के संयोजक तुलसी संगतानी ने रेखांकित किया कि इस आयोजन का मूल ध्येय युवा पीढ़ी को उनकी मातृभाषा और समृद्ध साहित्यिक विरासत से रूबरू कराना है। इसी क्रम में प्रसिद्ध साहित्यकार भगवान अटलानी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सिंधी भाषा हमारी पहचान है और इस पर गर्व करना अनिवार्य है। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि अपनी मातृभाषा सीखकर न केवल हम संस्कृति को बचा सकते हैं, बल्कि सिविल सेवा और शिक्षा जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों में भी करियर के नए आयाम स्थापित कर सकते हैं।

काव्य गोष्ठी का मुख्य आकर्षण वरिष्ठ कवियों का पाठ रहा, जिसमें जयपुर के वरिष्ठ कवि खेमचंद गोकलानी ने अपने बिछड़े हुए सिंध की स्मृतियों को जीवंत करते हुए मार्मिक कविताएं सुनाईं। देशभक्ति के स्वर को बुलंद करते हुए हरीश कर्मचंदानी ने एक मजबूत हिंदुस्तान का सपना अपनी पंक्तियों में पिरोया, वहीं डॉ. रूपा मंगलानी ने 'उथो हिन्द जा अगवानु उथो, भारत जो जय जय गान लिखो' के ओजस्वी आह्वान के साथ भारत के नेतृत्व को राष्ट्र का यशगान लिखने के लिए प्रेरित किया। मानवीय संवेदनाओं को स्वर देते हुए डॉ. माला कैलाश ने अपनी रचना 'खामोशियां सुनती हैं' से गहरा प्रभाव छोड़ा। मातृत्व की महिमा को पूजा चंदवानी ने अपनी लोरी के माध्यम से प्रस्तुत किया, तो लक्ष्मण पुरुसवाणी ने यादों के हिसाब-किताब पर गहरी दार्शनिक रचना पढ़ी।

रिश्तों की गहराई को चित्रेश रिझवानी ने पिता-पुत्र के संबंधों के माध्यम से उकेरा, जबकि तुलसी संगतानी ने अपनी कविता 'एक छोटी सी मुलाकात' से महफिल में मिठास भर दी। आयोजन के उत्तरार्ध में वंदिता आहूजा, कविता तनवानी, अजमेर से आईं कमला बूटानी, गीता गोकलानी, जय किशन गुरबाणी, टोंक से ऋचा इसरानी और जोधपुर की ऋतिका मनवानी ने अपनी विशिष्ट काव्य शैलियों से कार्यक्रम को पूर्णता प्रदान की। यह सम्मेलन केवल शब्दों का मेल नहीं था, बल्कि सिंधी समाज की जीवंतता और उसकी भाषाई विरासत को अक्षुण्ण रखने का एक सशक्त संकल्प बनकर उभरा, जिसने अंततः समाज में नई साहित्यिक चेतना का सूत्रपात किया।

Pratahkal Newsroom

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