सिंधी समाज ने गोगिड़ो पर्व पर की नाग देवता की पूजा, दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश
जयपुर में सिंधी समाज ने गोगिड़ो पर्व श्रद्धा से मनाया। महिलाओं ने नाग देवता की पूजा कर ठंडे पकवानों का भोग लगाया और प्रकृति व जीव संरक्षण का संदेश दिया। बुधवार को नंढ़ी सतहिं का पर्व मनाया जाएगा।

तस्वीर में जयपुर के एक मंदिर परिसर में हरे-भरे मैदान के पास मेज पर सजी पूजा सामग्री के आसपास खड़ी सिंधी समाज की महिलाएं नाग देवता के पूजन के दौरान नजर आ रही हैं।
जयपुर, 17 अगस्त। सिंधी समाज का सांस्कृतिक एवं धार्मिक पर्व गोगिड़ो सोमवार को श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महिलाओं ने गोगिड़ो वीर (नाग देवता) की पूजा-अर्चना कर अपने बच्चों और सुहाग की मंगल कामना की। शहर के विभिन्न झूलेलाल मंदिरों में महिलाओं ने छोटे-छोटे समूहों में गाय के गोबर एवं मिट्टी से नाग देवता की आकृति बनाकर विधिवत पूजन किया।
पूजन के दौरान गोगिड़ो वीर को ठंडे पकवानों का भोग लगाया गया। पूजा के बाद घरों में भी ठंडे पकवानों का ही सेवन किया गया। सिंधी समाज की परंपरा के अनुसार इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया गया और पूर्व में तैयार किए गए ठंडे व्यंजनों का ही प्रसाद के रूप में सेवन किया गया।
समाज के तुलसी संगतानी ने बताया कि सिंधी समाज प्राचीन काल से ही प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम की भावना रखता आया है। नाग देवता को कृषि एवं पर्यावरण के अनुकूल मानते हुए उनकी पूजा की जाती है। उन्होंने बताया कि खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों सहित अन्य जीवों की संख्या को नियंत्रित करने में सर्प महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस दृष्टि से नाग पूजा प्रकृति के संतुलन और जीव संरक्षण का भी संदेश देती है।
कुछ श्रद्धालुओं ने सपेरों से नाग-नागिन लेकर उन्हें सुरक्षित रूप से जंगल में छोड़ने का कार्य भी किया। वहीं, कुछ भक्तों ने शिव मंदिरों में कालसर्प दोष निवारण की पूजा-अर्चना करवाई।
नाग पंचमी का आध्यात्मिक महत्व भी इस पर्व से जुड़ा है। नाग पूजा का भारतीय संस्कृति में गहरा आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवताओं और दानवों ने अमृत प्राप्ति के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी बनाकर समुद्र मंथन किया था और वासुकि नाग को रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया था। वासुकि नाग भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं और शिवजी के गले की शोभा बढ़ाते हैं।
इसी प्रकार शेषनाग को ब्रह्मांडीय संतुलन का आधार माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि शेषनाग अपने फनों पर पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। इसलिए नाग पंचमी और नाग पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीव दया, पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के संतुलन का संदेश भी देती है।
नागों को देवता मानकर उनकी पूजा करने के पीछे सिंधु संस्कृति की वह व्यापक भावना निहित है, जिसमें प्रत्येक जीव-जंतु में ईश्वर के अंश को देखने और प्रकृति के साथ प्रेम करने की सीख दी गई है।
शहर में शोभा बसंतानी, मीना मूलचंदानी, हिना नारवानी, सोनिया गिदवानी, मीनू संगतानी, राजकुमारी करनानी, कविता संभवानी, माधुरी सबनानी और रेखा तारानी सहित सिंधी महिलाओं ने नाग देवता की पूजा-अर्चना करते हुए अपने बच्चों व सुहाग की मंगल कामना की।
साईं मुकेश साध ने बताया कि बुधवार को नंढ़ी सतहिं (छोटी सप्तमी) का त्योहार मनाया जाएगा, जिसमें मां शीतला को ठंडे पकवानों का भोग लगाकर पूजा-अर्चना की जाएगी। इस तरह सिंधी समाज की धार्मिक परंपरा में आस्था के साथ प्रकृति और जीव-जंतुओं के संरक्षण का संदेश भी जुड़ा हुआ है।

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