“अच्छी आदतें ही वास्तविक मूल्यों की पहचान होती हैं। जो व्यक्ति जीवन में अच्छे संस्कारों को धारण करता है, वही नैतिकता के मार्ग पर अग्रसर रहता है।” यह कहना था मुख्य अतिथि प्रसिद्ध शिक्षाविद् और राष्ट्रीय सचिव शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, डॉ. अतुल कोठारी का जो 'चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास' विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला के भव्य उद्घाटन पर सभा को संबोधित कर रहे थे।


कार्यशाला का आयोजन एवं विवरण

  • आयोजक: राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में।
  • स्थान: विश्वविद्यालय परिसर।
  • तिथि: दिनांक 11 से 13 फरवरी, 2026 तक।

मुख्य अतिथि डॉ. अतुल कोठारी का संबोधन

डॉ. कोठारी ने अपने अभिभाषण में पंचकोश सिद्धांत पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश एवं आनंदमय कोश की व्याख्या की तथा प्रत्येक कोश को दैनिक जीवन के सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने प्रतिभागियों को इन कोशों के भावार्थ को आत्मसात करने एवं नियमित अभ्यास द्वारा इन्हें जीवन में उतारने का सुझाव दिया। उन्होंने आधुनिक शिक्षा में भारतीय मूल्यों के समावेश को अपरिहार्य बताया।

उन्होंने वर्तमान समय को ‘चरित्र संकट’ का दौर बताते हुए कहा कि समाज की अनेक समस्याओं की जड़ नैतिक मूल्यों में आ रही गिरावट है, तथा उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मनुष्य को ‘व्यक्ति’ इसलिए कहा गया है क्योंकि वह अपने विचारों, भावनाओं एवं कर्तव्यों को व्यक्त करने की क्षमता रखता है।

डॉ कोठारी ने यह आह्वान किया कि हम सब सीखने की प्रक्रिया में आजीवन विद्यार्थी बने रहें, क्योंकि निरंतर सीखना ही व्यक्तित्व विकास का आधार है। उन्होंने कहा कि खेलकूद, स्वच्छता एवं अनुशासित जीवनशैली से शरीर स्वस्थ रहता है, वहीं मन को शांत रखना मानसिक संतुलन के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि ज्ञान एवं विज्ञान का संबंध मस्तिष्क से होता है, इसलिए शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक एवं बौद्धिक विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए।


कुलपति प्रो. आनंद भालेराव का अध्यक्षीय उद्बोधन

कार्यक्रम के मुख्य संरक्षक व अध्यक्ष, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आनंद भालेराव ने कहा कि "शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास केवल एक संस्था नहीं हैं, यह भारत की शिक्षा-आत्मा को पुनर्जीवित करने का आंदोलन हैं। न्यास हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि मनुष्य का निर्माण हैं।"

प्रो भालेराव ने आगे बताया कि यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यशाला नहीं है। यह एक राष्ट्रीय संकल्प का प्रारम्भ हैं। एक ऐसा संकल्प जो व्यक्ति के भीतर से राष्ट्र के निर्माण तक जाता हैं। न्यास की दृष्टि में शिक्षा का लक्ष्य है - कर्तव्यबोध, संस्कार, राष्ट्र चेतना, सेवा भाव, आत्मा अनुशाशन और सत्यनिष्ठा।

कुलपति ने कार्यशाला के विषय पर जोर देते हुए कहा कि "राष्ट्र का निर्माण केवल सेनाओं से नहीं होता हैं, राष्ट्र का निर्माण चरित्रवान व्यक्तियों से होता हैं।" उन्होंने कहा कि व्यक्तित्व की ऊंचाई चरित्र की गहराई पर निर्भर करती हैं। यदि चरित्र नहीं हैं, तो व्यक्तित्व केवल प्रदर्शन बनकर रह जाता हैं। और प्रदर्शन बहुत जल्दी टूटता हैं।

कुलपति प्रो. भालेराव ने चरित्र निर्माण की महत्ता पर प्रकाश डाला और चरित्र और व्यक्तित्व विकास को आध्यात्मिक और विशिष्ट उदाहरणों से समझाया। अपने वक्तव्य के अंत में कुलपति ने कहा कि हम ये संकल्प ले कि हम स्वयं भी चरित्रवान बनेंगे, और दूसरों को भी चरित्रवान बनाने में योगदान देंगे।


औपचारिक कार्यक्रम एवं स्वागत सत्कार

इससे पूर्व दीप प्रज्वलन एवं पुष्प अर्पण के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हुआ जिसके पश्चात:

  • कुलपति प्रो आनंद भालेराव ने मुख्य अतिथि डॉ. अतुल कोठारी का शॉल, स्मृति चिन्ह व भगवद गीता भेंट कर स्वागत किया।
  • शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्रीय सह संयोजक डॉ. हार्दिक पाठक ने कुलपति प्रो आनंद भालेराव का भगवद गीता भेंट कर स्वागत किया।
  • सुश्री साँची मिश्रा द्वारा प्रस्तुत 'सरस्वती वंदना' ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
  • डॉ. मनमोहन सिंह ने मुख्य अतिथि डॉ. अतुल कोठारी का परिचय प्रस्तुत किया।
  • डॉ. ज्ञानरंजन पांडा ने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आनंद भालेराव का परिचय दिया।
  • डॉ. जयप्रकाश त्रिपाठी ने कार्यक्रम का संचालन किया।
  • सत्र के अंत में डॉ. भावेश कुमार परमार ने उपस्थित अतिथियों, संकाय सदस्यों एवं विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया।

कार्यशाला की रूपरेखा एवं उद्देश्य

कार्यशाला के कुल 11 सत्रों में 9 वक्ताओं द्वारा निम्नलिखित विषयों पर गहन विचार-विमर्श किया जाएगा:

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति में चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास।
  • अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश।
  • भारतीय ज्ञान परंपरा में चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास।
  • पंचकोश में मानसिक दृढ़ता का मानवीय–वैज्ञानिक आधार।
  • कौशल शिक्षा से आत्मनिर्भरता।

यह कार्यशाला चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास की भारतीय एवं आधुनिक अवधारणाओं के समन्वित अध्ययन हेतु आयोजित की जा रही है। इसका उद्देश्य शिक्षा, योग, दर्शन, मनोविज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान के विविध आयामों को एक साझा मंच पर लाकर मूल्य-आधारित, संतुलित एवं उत्तरदायी व्यक्तित्व के निर्माण पर विमर्श करना है। साथ ही, संकाय सदस्यों एवं प्रतिभागियों में सदाचार, आत्म-अनुशासन, भावनात्मक संतुलन, नैतिक विवेक एवं शैक्षिक–सामाजिक उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करना है, जिससे वे उच्च शिक्षा के माध्यम से संस्कारयुक्त, संवेदनशील एवं राष्ट्रोपयोगी मानव संसाधन के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा सकें।

Pratahkal Bureau

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