धनतेरस को आमतौर पर धन-संपदा और समृद्धि की कामना से जुड़ा पर्व माना जाता है, लेकिन इसका महत्व केवल भौतिक संपत्ति तक सीमित नहीं है। यह पर्व आरोग्य, दीर्घायु और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का संदेश भी देता है। आयुर्वेद परंपरा में धनतेरस का विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन भगवान धन्वंतरि की जयंती मनाई जाती है। समुद्र मंथन से प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का आदि प्रवर्तक और आरोग्य का देवता माना जाता है।

आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र कुमावत चिराना के अनुसार, भगवान धन्वंतरि की जयंती इस भू-लोक पर युगों से मनाई जाती रही है। यह पर्व आयुर्वेद विभाग का स्मृति पर्व होने के साथ ही सभी को सद्व्रत और स्वास्थ्यव्रत अपनाने के लिए प्रेरित करता है। दीपावली पर्व का शुभारंभ भी धन्वंतरि जयंती से ही होता है। इस दिन से घरों में रात्रि के समय दीपमालाएं प्रज्वलित की जाती हैं। पर्व से एक महीना पहले ही घरों में साफ-सफाई, लिपाई-पुताई और सजावट का कार्य शुरू हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो घरों में स्वच्छता का साम्राज्य स्थापित हो रहा हो।

स्वास्थ्य की दृष्टि से धनतेरस का समय वर्ष का सर्वश्रेष्ठ काल माना जाता है। इस दौरान सर्वत्र स्वास्थ्य, उल्लास और प्रसन्नता का वातावरण दिखाई देता है। ऐसी मान्यता है कि इस पर्व के समय भगवान सोमबल का विसर्ग करते हैं। देश के सबसे विशाल ग्रामीण अंचल में लगभग 80 प्रतिशत लोग निवास करते हैं। यहां सदियों से आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति अपनाई जाती रही है, लेकिन वर्तमान समय में इसकी आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है।

डॉ. कुमावत का कहना है कि बदलते समय में हमें अपनी क्षमता के अनुसार आयुर्वेद पर विश्वास बढ़ाना चाहिए। चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहे नवाचारों और विकसित हो रहे नए आयामों को अपनाते हुए आयुर्वेद के माध्यम से आरोग्य की दिशा में आगे बढ़ना जरूरी है। वर्तमान में आयुर्वेद के क्षेत्र में लगातार नए अनुसंधान हो रहे हैं। पंचकर्म चिकित्सा पद्धति का प्रभाव भी देश-दुनिया में तेजी से फैल रहा है। इन उपलब्धियों को अपनाते हुए महंगाई के इस दौर में आयुर्वेद को महत्व देना चाहिए।

धनतेरस को श्रीवृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन बर्तन, आभूषण, वस्त्र सहित घर के लिए कोई भी नई वस्तु खरीदने की परंपरा है। इस प्रकार यह पर्व स्वास्थ्य और समृद्धि दोनों का अनूठा संगम है।

धनतेरस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि जीवन में स्वास्थ्य से बढ़कर कोई धन नहीं है। व्यक्ति के पास कितनी भी भौतिक संपत्ति क्यों न हो, यदि उसका शरीर और मन स्वस्थ नहीं है तो वह उस संपदा का वास्तविक आनंद नहीं ले सकता। आयुर्वेद केवल रोग होने पर उपचार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि रोगों से बचाव और स्वास्थ्य की रक्षा को भी समान महत्व देता है। इसी उद्देश्य को आयुर्वेद में 'स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्' के सिद्धांत के रूप में प्रमुखता दी गई है।

स्वस्थ जीवन के लिए आयुर्वेद सबसे पहले भोजन को औषधि के समान समझने की सीख देता है। भूख के अनुसार ताजा और सुपाच्य भोजन करना चाहिए। अत्यधिक तला-भुना, मीठा, पैकेज्ड तथा आवश्यकता से अधिक भोजन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

नियमित दिनचर्या भी स्वस्थ जीवन का महत्वपूर्ण आधार है। समय पर सोना, समय पर उठना, नियमित व्यायाम और भोजन का उचित समय शरीर की प्राकृतिक लय बनाए रखने में सहायक होता है। इसके साथ ही प्रतिदिन कुछ समय शरीर के लिए निकालना जरूरी है। नियमित पैदल चलना, योग, प्राणायाम और अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम शरीर को सक्रिय रखने के सरल उपाय हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी आवश्यक है। तनाव, क्रोध, चिंता और अनियमित नींद शरीर के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। ध्यान, प्राणायाम, सकारात्मक सोच और परिवार के साथ संवाद मन को संतुलित रखने में सहायक होते हैं।

आयुर्वेद में ऋतुचर्या का भी विशेष महत्व बताया गया है। मौसम के अनुसार भोजन, वस्त्र, दिनचर्या और जीवनशैली में उचित बदलाव करने से शरीर को बदलते वातावरण के अनुकूल बनाने में मदद मिलती है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में धन्वंतरि जयंती की उपयोगिता भी इसी संदेश में निहित है कि चिकित्सा केवल रोगों को समाप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की संस्कृति है। इस अवसर पर आयुर्वेद के सिद्धांतों को अपनाने, चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने और समाज में स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया जा सकता है।

डॉ. राजेंद्र कुमावत ने धनतेरस के अवसर पर आह्वान किया कि केवल धन की वृद्धि की कामना करने के बजाय स्वास्थ्य रूपी अमूल्य संपदा को सुरक्षित रखने का संकल्प भी लिया जाए। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, संयमित जीवनशैली और सकारात्मक सोच को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। उनका संदेश है कि सच्चा धन वही है, जिसे स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन और दीर्घ जीवन के रूप में संजोया जा सके।


इस अवसर का संकल्प है—स्वास्थ्य को पहला स्थान दें और आयुर्वेद को जीवन की पहचान बनाएं।

उन्होंने भगवान धन्वंतरि की वंदना करते हुए कहा—

आयुर्वेद ज्ञान के दाता।

मंगल-सुख-आरोग्य प्रदाता।

हरते प्रभु जनमन का क्रंदन,

हे धन्वंतरी शत-शत वंदन।।

इस प्रस्तुति के लेखक डॉ. राजेंद्र कुमावत चिराना हैं, जो SMO आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं। वे श्री गणेश मेडिकल स्टोर, सीकर रोड, चिराना, झुंझुनूं से संबद्ध हैं। उनका संपर्क नंबर 9829483955 है।

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