जयपुर: दशलक्षण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की आराधना, निर्वाण लड्डू चढ़ाए
जैन मंदिरों में भगवान पुष्पदंत का निर्वाण कल्याणक मनाया गया; अभिषेक जैन बिट्टू ने अंतर्मन की पवित्रता और संतोष का संदेश दिया।

जयपुर। दिगंबर जैन समाज के पवित्र दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन शनिवार, 19 सितंबर 2026 को राजधानी जयपुर सहित देश-दुनिया के जैन मंदिरों में “उत्तम शौच धर्म” की आराधना श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ की गई। इस दौरान श्रावक-श्राविकाओं ने जिनालयों में अंतर्मन की शुद्धता के साथ तीर्थंकर भगवानों का श्रद्धापूर्वक गुणगान किया। अष्टद्रव्यों के साथ विधान-पूजन कर अर्घ्य समर्पित किए गए और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से कर्मों की निर्जरा की भावना व्यक्त की गई।
शनिवार को जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत स्वामी का निर्वाण कल्याणक पर्व भी श्रद्धापूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर जैन मंदिरों में मंगलाष्टक, जयमाला पाठ एवं निर्वाणकांड पाठ का वाचन किया गया। मंत्रोच्चार के साथ भगवान के चरणों में निर्वाण लड्डू समर्पित किए गए।
अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ के अध्यक्ष अभिषेक जैन बिट्टू ने “उत्तम शौच धर्म” के महत्व पर कहा कि “शौच भावना हमें अंतर्मन की पवित्रता और संतोष का मार्ग दिखाती है। प्राणी पेट तो भर सकता है, लेकिन पेटी नहीं भर सकता। इसके बावजूद आज मनुष्य केवल अपनी ‘पेटी’ भरने में लगा हुआ है। इसी असीम संग्रह की प्रवृत्ति के कारण मन की पवित्रता नष्ट होती जा रही है और व्यक्ति ‘99 के चक्कर’ में उलझता जा रहा है।”
उन्होंने कहा कि “ईमानदारी से पेट भरा जा सकता है, लेकिन तिजोरी भरने के लिए यदि बेईमानी, अन्याय और अनीति का सहारा लिया जाए तो उस धन की शांति और स्थायित्व नहीं रहता। अधर्म से अर्जित द्रव्य कभी बीमारी के इलाज में, कभी ऑपरेशन में, कभी कानूनी परेशानियों में अथवा अन्य संकटों में नष्ट हो जाता है। लोभ के साथ मनुष्य के जीवन में अनेक बुराइयां जुड़ती चली जाती हैं।”
बिट्टू ने कहा कि “हमारी आवश्यकताएं सीमित हों तो हमें लोभ का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। संतोषी व्यक्ति परिग्रह को सीमित रखता है और ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के आदर्शों को अपनाकर जीवन जीता है। हमारे आचार्यों का संदेश है कि अज्ञानतावश एक बार ठगा जाना उतना बुरा नहीं, जितना लालचवश दूसरों को ठगना। गलत संस्कारों का बीज यदि समय रहते नहीं रोका जाए तो व्यक्ति लंबे समय तक गलत कार्यों में उलझा रह सकता है। इसलिए सही मार्गदर्शन और संस्कारों की आवश्यकता है।”
उन्होंने कहा कि “‘और अधिक चाहिए’ की प्रवृत्ति को छोड़कर संतोष को धारण करना चाहिए। जीवन में सद्गुणों की प्राप्ति अधिक से अधिक हो, यह भावना निरंतर बढ़ती रहे और परिग्रह के संचय की भावना कम से कम हो—यही उत्तम शौच धर्म का सार है।”
अभिषेक जैन बिट्टू ने बताया कि रविवार को दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन “उत्तम सत्य धर्म” की आराधना की जाएगी। इस अवसर पर जैन मंदिरों में विधान-पूजन सहित विभिन्न धार्मिक आयोजन होंगे। इस प्रकार दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की आराधना के साथ संतोष, अंतर्मन की पवित्रता और परिग्रह को सीमित रखने का संदेश प्रमुख रहा।

