राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ विक्रम संवत् 2083 का भव्य स्वागत

अजमेर। भारतीय शिक्षण मंडल, चित्तौड़ प्रांत की राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूराज) इकाई द्वारा “भारतीय ज्ञान संपदा गतिविधि” के अंतर्गत विक्रम संवत् 2083 के शुभारंभ के अवसर पर वर्ष प्रतिपदा उत्सव का गरिमामय आयोजन किया गया। यह विशेष कार्यक्रम भारतीय नववर्ष के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया, जो विश्वविद्यालय के माननीय कुलगुरु प्रो. आनन्द भालेराव के कुशल मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ सिद्धार्थ शर्मा द्वारा प्रस्तुत संगठन मंत्र से हुआ। इसके पश्चात सत्यम राय ने ध्येय श्लोक तथा गौतम मिश्र ने ध्येय वाक्य का उच्चारण किया, जिससे संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो गया। अनुष्ठान के अगले चरण में दीप प्रज्ज्वलन एवं भारत माता के चित्र पर श्रद्धापूर्वक पुष्पांजलि अर्पित की गई। प्रो. राघवेन्द्र भट्ट ने स्वागत भाषण देते हुए वर्ष प्रतिपदा के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला तथा उपस्थित जनसमूह को नववर्ष की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने इस सफल आयोजन हेतु कुलपति महोदय एवं भारतीय शिक्षण मंडल इकाई के प्रति विशेष आभार भी व्यक्त किया।

भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक संरक्षण पर विमर्श

डॉ. धनेश्वर प्रुस्टी (मंत्री, सीयूराज इकाई) ने अपने संबोधन में "भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया" जबकि डॉ. ज्ञानरंजन पांडा (अध्यक्ष, सीयूराज इकाई) ने भारत की अवधारणा पर अपने विचार रखे। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे "भारत को उसकी मूल पहचान के साथ स्वीकार करें" और वर्ष प्रतिपदा के महत्व को रेखांकित करते हुए इसे पूर्ण गर्व के साथ मनाने की आवश्यकता बताई। यह आयोजन न केवल भारतीय नववर्ष के स्वागत का अवसर बना बल्कि विद्यार्थियों में सांस्कृतिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं राष्ट्रनिर्माण के प्रति प्रेरणा जागृत करने का एक सार्थक प्रयास भी सिद्ध हुआ।

भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता और ऐतिहासिक संदर्भ

मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. राजीव एम. एम. (प्रचार प्रमुख, चित्तौड़ प्रांत) ने भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता एवं उसके सांस्कृतिक महत्व पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने जानकारी साझा की कि "वर्ष प्रतिपदा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न रूपों में मनाई जाती है तथा इसके ऐतिहासिक संदर्भों, विशेषतः विक्रमादित्य से संबंधित परंपराओं, को समझना आवश्यक है।" उन्होंने युवाओं से इस महान परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाने का आग्रह किया ताकि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व कर सकें। मुख्य वक्ता ने भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता और विक्रमादित्य से संबंधित ऐतिहासिक परंपराओं को समझने पर विशेष बल दिया।

उन्नत प्राचीन विज्ञान और आभार प्रदर्शन

कार्यक्रम के अंतिम चरण में डॉ. शैलेश पाटीदार (उपाध्यक्ष, सीयूराज इकाई) ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में "प्राचीन भारतीय विज्ञान की उन्नत परंपरा पर प्रकाश डाला" और सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह का औपचारिक समापन देवांश कौशिक द्वारा प्रस्तुत कल्याण मंत्र के साथ हुआ। इस अवसर पर प्रो. राजेश कुमार (शैक्षणिक गतिविधि प्रमुख, सीयूराज इकाई), डॉ. जयप्रकाश त्रिपाठी (प्रांत मंत्री), डॉ. भगवान, डॉ. अक्षांश भारद्वाज (प्रकाशन प्रमुख, चित्तौड़ प्रांत), डॉ. सोमनाथ (प्रचार प्रमुख, सीयूराज इकाई), प्रो. के. वी. अघाड़ी, केशव शर्मा सहित अनेक शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। सभी उपस्थित जनों ने इसे भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा के पुनर्स्मरण का एक सशक्त माध्यम माना।

Pratahkal Bureau

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