राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में वीर सावरकर जयंती मनाई गई, कुलपति ने किया संबोधित
कुलपति प्रो. आनंद भालेराव ने सावरकर को राष्ट्रीय पुनरुत्थान का अद्वितीय चिंतक बताते हुए युवाओं से वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।

राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में वीर विनायक दामोदर सावरकर जयंती कार्यक्रम के दौरान सावरकर के चित्र पर माल्यार्पण करते कुलपति प्रो. आनंद भालेराव (मध्य), कुलसचिव अमरदीप शर्मा (दाएं) और अन्य अतिथि।
वीर विनायक दामोदर सावरकर जयंती के अवसर पर राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित भव्य कार्यक्रम में कुलपति प्रो. आनंद भालेराव ने वीर सावरकर को राष्ट्रवाद, वैचारिक संघर्ष और राष्ट्रीय पुनरुत्थान का अद्वितीय चिंतक बताते हुए कहा कि यदि महात्मा गांधी ने भारत की आत्मा को नैतिक प्रतिरोध की शक्ति दी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारत को सैन्य प्रतिरोध का स्वर दिया, तो वीर सावरकर ने भारत को राष्ट्रीय सामर्थ्य का बौद्धिक ढांचा प्रदान किया। उन्होंने कहा कि सावरकर केवल बंदूक की भाषा नहीं जानते थे, बल्कि वे मनोवैज्ञानिक युद्ध, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, राजनीतिक संगठन, सैनिकीकरण, इतिहास लेखन और राष्ट्रीय मानस निर्माण के रणनीतिक चिंतक थे।
कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति प्रो. आनंद भालेराव द्वारा वीर सावरकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि सावरकर जी का मानना था कि जिस राष्ट्र का इतिहास पराजय की भाषा में लिखा जाता है, उसके युवाओं का आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने भारतीय इतिहास को नए दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित किया और “अभिनव भारत” की स्थापना कर राष्ट्रवाद को नई वैचारिक दिशा प्रदान की।
प्रो. भालेराव ने कहा कि सावरकर अत्यंत दूरदर्शी एवं नवोन्मेषी चिंतक थे, जिन्होंने प्रतिरोध की नई संरचना को तीन स्तरों पर स्थापित किया। उन्होंने भय को तोड़ने, इतिहास-साहित्य और राष्ट्रीयता की नई व्याख्या करने तथा सैनिकीकरण के माध्यम से राष्ट्र को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की अवधारणा को आगे बढ़ाया।
उन्होंने सावरकर जी की प्रसिद्ध कविता “ने मजसी ने परत मातृभूमिला” का उल्लेख करते हुए उसके भावार्थ को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि इस कविता में मातृभूमि के प्रति सावरकर जी का अथाह प्रेम और समर्पण झलकता है, जिसमें वे सागर से अपनी जन्मभूमि वापस ले चलने की प्रार्थना करते हैं।
कुलपति ने कहा कि सावरकर परंपराओं के समर्थक अवश्य थे, लेकिन अंधपरंपराओं के नहीं। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी विकास, औद्योगीकरण और सैन्य आधुनिकीकरण के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे बौद्धिक रूप से सशक्त, शारीरिक रूप से अनुशासित, सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़े तथा वैज्ञानिक दृष्टि से आधुनिक बनें और अपनी सभ्यतागत जिम्मेदारियों को भी समझें।
प्रो. आनंद भालेराव ने सावरकर जी के जीवन से जुड़े अनेक प्रेरणादायी प्रसंग साझा करते हुए कहा कि उन्होंने असहनीय यातनाएं सहते हुए भी राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा और अपना संपूर्ण जीवन मातृभूमि को समर्पित कर दिया। उन्होंने कहा कि सावरकर त्याग, साहस और समर्पण के जीवंत प्रतीक थे।
कार्यक्रम में महिलाओं की भूमिका पर सावरकर जी के विचारों का भी उल्लेख किया गया। प्रो. भालेराव ने कहा कि सावरकर महिलाओं में साहस और आत्मविश्वास के विकास के पक्षधर थे तथा चाहते थे कि महिलाएं नई पीढ़ी को राष्ट्ररक्षा और राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करें। उन्होंने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम को भारतीय नारी शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण बताया।
उन्होंने कहा कि ऐसे महान क्रांतिकारियों से प्रेरणा लेना आवश्यक है, जिन्होंने यह सिखाया कि जीवन में कैसी भी परिस्थितियां हों, मातृभूमि का स्थान सदैव सर्वोपरि होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय में महापुरुषों की जयंती मनाने की परंपरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक पुण्य कार्य है, जिसके माध्यम से नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, त्याग, साहस और आदर्श जीवन मूल्यों की प्रेरणा मिलती है।
कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने वीर विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिमा के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित की। अंत में कुलसचिव अमरदीप शर्मा ने वीर सावरकर के बलिदान को नमन करते हुए सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन जनसंपर्क अधिकारी अनुराधा मित्तल ने किया।

Pratahkal Bureau
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