CSIR-IMMT भुवनेश्वर में ‘वेस्ट टू वैल्यू’ की नई दिशा, कचरे से निकलेंगे महत्वपूर्ण खनिज
CSIR-IMMT भुवनेश्वर में महत्वपूर्ण खनिजों और ‘वेस्ट टू वैल्यू’ पर अनुसंधान जारी है। फ्लाई ऐश, सौर पैनल और अन्य अपशिष्टों से उपयोगी सामग्री व REEs की प्राप्ति के लिए नई तकनीकों पर काम हो रहा है।

तस्वीर में पत्रकारों का दल और सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ मिनरल एंड मैटेरियल्स टेक्नोलॉजी (CSIR-IMMT) के अधिकारी भुवनेश्वर स्थित संस्थान परिसर के बाहर खड़े नजर आ रहे हैं।
भुवनेश्वर में सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ मिनरल एंड मैटेरियल्स टेक्नोलॉजी (CSIR-IMMT) में ‘वेस्ट टू वैल्यू’ और महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर अनुसंधान नई दिशा में आगे बढ़ रहा है। राजस्थान से ओडिशा पहुंचे पत्रकारों के एक दल ने 16 सितंबर 2026 को संस्थान का दौरा किया और वहां चल रही विभिन्न अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास परियोजनाओं को देखा। दल ने अनुसंधान को औद्योगिक उपयोग में बदलने की प्रक्रिया को भी समझा।
CSIR-IMMT खनन, खनिज और धातु उद्योगों से जुड़ी अनुसंधान एवं विकास संबंधी चुनौतियों के समाधान के साथ खनिज संसाधनों के टिकाऊ उपयोग, मूल्यवर्धन और उन्नत प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों के विकास पर काम कर रहा है।
संस्थान के निदेशक प्रोफेसर रामानुज नारायण ने पत्रकारों के दल को संस्थान में चल रही विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्थान का विशेष ध्यान खनिज प्रसंस्करण, महत्वपूर्ण खनिजों और औद्योगिक तथा अन्य अपशिष्टों से उपयोगी एवं मूल्यवान सामग्री की प्राप्ति पर है।
उन्होंने बताया कि संस्थान में वर्तमान अनुसंधान परियोजनाओं के तहत कोयला अवशेष, फ्लाई ऐश, रेड मड और अन्य द्वितीयक संसाधनों से दुर्लभ मृदा तत्वों (REEs) तथा अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की प्राप्ति पर काम किया जा रहा है। कोबाल्ट, निकल, टाइटेनियम, वैनेडियम, लिथियम, मैंगनीज और दुर्लभ मृदा तत्वों जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की प्राप्ति एवं प्रसंस्करण से जुड़ी प्रौद्योगिकियों पर भी अनुसंधान जारी है।
प्रोफेसर रामानुज ने बताया कि संस्थान अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलने के लिए भी अनुसंधान कर रहा है। इसके लिए विकसित पायलट संयंत्र की क्षमता प्रतिदिन 50 किलोग्राम फ्लाई ऐश के प्रसंस्करण की है। संयुक्त रूप से विकसित और पेटेंट कराई गई प्रक्रिया के माध्यम से फ्लाई ऐश से एल्युमिना, कैल्शियम सिलिकेट, क्वार्ट्ज अवशेष और दुर्लभ मृदा तत्वों से समृद्ध आयरन हाइड्रॉक्साइड अवशेष जैसे उत्पाद प्राप्त करने पर काम चल रहा है। यह प्रक्रिया औद्योगिक अपशिष्ट से उपयोगी घटकों को अलग कर उनका मूल्य बढ़ाने की क्षमता को दर्शाती है और ‘वेस्ट टू वैल्यू’ की अवधारणा को बढ़ावा देती है।
उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती मांग को देखते हुए CSIR-IMMT प्राथमिक और द्वितीयक दोनों स्रोतों से दुर्लभ मृदा तत्वों की प्राप्ति पर अनुसंधान कर रहा है। संस्थान की विभिन्न परियोजनाओं में क्षारीय चट्टानों जैसे प्राथमिक स्रोतों तथा कोयला अवशेष, फ्लाई ऐश और रेड मड जैसे द्वितीयक स्रोतों से REEs की प्राप्ति शामिल है। इसी तरह, महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान एवं विकास के लिए ऑयल इंडिया के साथ सहयोग भी चल रहा है। इन पहलों का उद्देश्य प्रयोगशाला स्तर पर विकसित प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर उपयोग और औद्योगिक अनुप्रयोगों की दिशा में आगे बढ़ाना है।
डॉ. रामानुज नारायण ने कहा कि भारत के निम्न श्रेणी के खनिजों, सौर पैनलों और इलेक्ट्रॉनिक कचरे में महत्वपूर्ण आर्थिक क्षमता है। संस्थान सौर अपशिष्ट से महत्वपूर्ण खनिज निकालने की प्रौद्योगिकियों पर काम कर रहा है। उनका मानना है कि वैज्ञानिकों, उद्योग और युवाओं के सहयोग से वर्ष 2040 तक अपशिष्ट को संसाधनों में बदलने के लिए एक मजबूत तंत्र तैयार किया जा सकता है।
श्री नारायण ने बताया कि राजस्थान में सौर ऊर्जा के विस्तार को देखते हुए CSIR सौर पैनलों के पुनर्चक्रण से महत्वपूर्ण खनिजों की प्राप्ति के लिए प्रौद्योगिकियां विकसित कर रहा है। राजस्थान और गुजरात में बड़े सौर ग्रिड को देखते हुए सौर पैनलों से कांच, सिलिकॉन और अन्य घटकों की प्राप्ति पर काम चल रहा है। इसके लिए आने वाले वर्षों में पायलट संयंत्रों और उन्नत हाइड्रोमेटलर्जी तकनीकों के माध्यम से महत्वपूर्ण खनिजों की प्राप्ति का विस्तार किया जाएगा।
ओडिशा देश के प्रमुख खनिज-समृद्ध राज्यों में शामिल है। ऐसे में खनन के साथ खनिज प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़ी स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास महत्वपूर्ण है। CSIR-IMMT में चल रहा अनुसंधान विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उद्योग के बीच सहयोग के माध्यम से खनिज संसाधनों के बेहतर और टिकाऊ उपयोग की संभावनाओं को सामने रखता है।
दौरे के दौरान पत्रकारों के दल ने संस्थान की विभिन्न अनुसंधान और प्रायोगिक सुविधाओं का अवलोकन किया तथा अनुसंधान प्रक्रिया, प्रौद्योगिकी विकास और इसके औद्योगिक उपयोग से जुड़े विषयों पर वैज्ञानिकों एवं अधिकारियों से बातचीत की।
इसके बाद पत्रकारों के दल ने ऐतिहासिक उदयगिरि-खंडगिरि गुफाओं का भी दौरा किया। वहां उन्होंने इन प्राचीन शैल-कट गुफाओं की स्थापत्य एवं ऐतिहासिक विरासत को देखा। ये गुफाएं जैन परंपरा से जुड़ी हैं और इनका निर्माण खारवेल तथा उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में हुआ था।
उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाओं में दो मंजिला रानीगुम्फा तथा स्वर्णपुरी-मंचपुरी गुफाएं उल्लेखनीय हैं। हाथीगुम्फा में ईसा पूर्व पहली शताब्दी की ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण खारवेल का अभिलेख उनके शासनकाल के महत्वपूर्ण कार्यों का विवरण देता है। बारहभुजी गुफा में उत्कीर्ण 24 तीर्थंकरों और उनके शासन देवताओं की आकृतियां तथा अनंत गुफा में गजलक्ष्मी, सूर्य और स्वस्तिक के चित्रण प्राचीन भारतीय कला और शिल्पकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
इस यात्रा के दौरान पत्रकारों ने CSIR-IMMT की अनुसंधान एवं प्रायोगिक सुविधाओं के साथ प्रौद्योगिकी विकास और औद्योगिक अनुप्रयोगों की प्रक्रिया को समझा तथा उदयगिरि-खंडगिरि गुफाओं के माध्यम से ओडिशा की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी जाना।

