राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में व्यास पूजन, गुरु-शिष्य परंपरा और भारतीय ज्ञान परंपरा पर मंथन
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में व्यास पूजन कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें गुरु-शिष्य परंपरा और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विचार रखे गए।

तस्वीर में राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान अतिथि दीप प्रज्वलित करते हुए नजर आ रहे हैं, जिनके सामने मां सरस्वती और भारत माता के चित्र रखे हैं।
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय परिसर में भारतीय शिक्षण मंडल, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय इकाई द्वारा कुलपति प्रो. आनंद भालेराव के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से व्यास पूजन का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ संगठन मंत्र, ध्येय श्लोक, ध्येय वाक्य, मां सरस्वती एवं आदिगुरु महर्षि वेदव्यास के पूजन तथा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
कार्यक्रम में भारतीय शिक्षण मंडल, चित्तौड़ प्रांत के प्रांत उपाध्यक्ष डॉ. अनिल गुप्ता तथा श्री जगदीश प्रसाद साहू की विशेष उपस्थिति रही। श्री जगदीश प्रसाद साहू ने सभी अतिथियों का परिचय कराते हुए व्यास पूजन के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यास पूजन भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञान-साधना और संस्कृति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है।
कार्यक्रम में डॉ. अनिल गुप्ता ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि संसार की अनेक जटिल समस्याओं के समाधान महर्षि वेदव्यास के साहित्य में निहित हैं। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि संस्कार, चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण करना है।
डॉ. गुप्ता ने कहा कि भारतीय संस्कृति उत्सवधर्मी है, जो समाज में सामूहिकता, सहयोग और समरसता के गुणों का विकास करती है। उन्होंने आह्वान किया कि ज्ञान का उपयोग सदैव मानवता के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।
इस अवसर पर राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के डीन अकादमिक प्रो. डी. सी. शर्मा, भारतीय शिक्षण मंडल, राजस्थान इकाई के अध्यक्ष प्रो. ज्ञान रंजन पांडा, व्यवस्था प्रमुख श्री अखिल अग्रवाल तथा उच्च शिक्षा गतिविधि सह-प्रमुख डॉ. प्रीति गोटमारे ने भी अपने उद्बोधनों में महर्षि वेदव्यास के भारतीय ज्ञान परंपरा में योगदान, गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता और भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन तक सीमित नहीं है, बल्कि चरित्र निर्माण, संस्कारों का संवर्धन, राष्ट्र निर्माण और मानवता के कल्याण की भावना का विकास करना भी है।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री अमरदीप शर्मा, उपकुलसचिव श्री मनीष भोमिया, डीन छात्र कल्याण प्रो. झोरे, अनुसंधान एवं विकास निदेशक डॉ. तिवारी, प्रो. अमिताभ श्रीवास्तव तथा परीक्षा नियंत्रक डॉ. एस. मोहन की भी विशेष उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. गाथा ठक्कर ने किया। आयोजन को सफल बनाने में डॉ. धनेश्वर प्रुष्टि, डॉ. प्रमोद कांबले, डॉ. शैलेश पाटीदार, प्रो. के. वी. अगड़ी, डॉ. रवि वोडेयार, श्री केशव शर्मा, डॉ. जय प्रकाश त्रिपाठी, डॉ. ओम करण, डॉ. गजानन सर्वज्ञ, डॉ. अक्षांश भारद्वाज, डॉ. सोमनाथ तथा डॉ. राजेंद्र पवार का विशेष योगदान रहा।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। सभी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और भारतीय जीवन-मूल्यों के प्रसार का संकल्प लिया। अंत में प्रार्थना एवं कल्याण मंत्र के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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