राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में लोकमान्य तिलक जयंती पर गूंजा स्वराज का संदेश, प्रो. आनंद भालेराव ने बताए राष्ट्रनिर्माण के पांच आधार
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। कुलपति प्रो. आनन्द भालेराव ने तिलक के राष्ट्रवाद, स्वराज्य और कर्मयोग के विचारों को राष्ट्रनिर्माण का आधार बताया, जबकि डॉ. सुरेश सिंह राठौड़ ने उनके संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान पर प्रकाश डाला।

तस्वीर में बाएं से दाएं राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आनन्द भालेराव, कुलसचिव अमरदीप शर्मा और वित्त अधिकारी प्रदीप अग्रवाल लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के चित्र के समीप खड़े दिखाई दे रहे हैं।
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयंती श्रद्धा, सम्मान और उत्साह के साथ मनाई गई। कार्यक्रम का शुभारंभ आधुनिक भारत के शिल्पकार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आनन्द भालेराव, कुलसचिव अमरदीप शर्मा एवं वित्त अधिकारी प्रदीप अग्रवाल सहित सभी अधिष्ठातागण, संकाय सदस्य, अधिकारी, कर्मचारी और विद्यार्थियों ने लोकमान्य तिलक के जीवन, संघर्ष तथा राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान का स्मरण किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. आनन्द भालेराव ने कहा कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जीवन प्रेरणा, संघर्ष, त्याग और विलक्षण मेधा का अद्भुत संगम है। उन्होंने कहा कि इसी कारण उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पकार कहा जाता है। उनके अनुसार तिलक ने अपने जीवन और विचारों से राष्ट्र को राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय शिक्षा, जनसंगठन, स्वराज्य की चेतना और कर्मयोग जैसे पाँच अमूल्य आधार प्रदान किए।
प्रो. भालेराव ने कहा कि लोकमान्य तिलक ने विद्वता, चरित्र और देशभक्ति का अपने जीवन से जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि तिलक सदाचारी थे, इसलिए विद्वान थे; विद्वान थे, इसलिए उन्होंने स्वार्थ का त्याग किया; स्वार्थ-त्यागी थे, इसलिए देशभक्त बने; देशभक्त थे, इसलिए उद्यमी थे; उद्यमी थे, इसलिए पराक्रमी थे; और पराक्रमी थे, इसलिए धैर्यवान थे। उन्होंने कहा कि इन्हीं गुणों ने उन्हें समाज को दिशा देने और उपदेश देने की वास्तविक पात्रता प्रदान की। प्रो. भालेराव ने कहा कि लोकमान्य तिलक ने संपूर्ण भारत को निर्भीक होकर यह विश्वास दिलाया कि स्वतंत्रता हमारा अधिकार है। उन्होंने स्वराज्य की चेतना को जन-जन तक पहुँचाकर राष्ट्र में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय जागरण का संचार किया।
अपने संबोधन में प्रो. भालेराव ने कहा कि यदि आज तिलक हमारे सामने होते, तो वे कहते—“श्रेष्ठ भारत का निर्माण हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है, श्रेष्ठ चरित्र हमारा जन्मसिद्ध कर्तव्य है और विकसित भारत हमारा राष्ट्रीय संकल्प है, जिसे हम सब मिलकर साकार करेंगे।” उन्होंने लोकमान्य तिलक के जीवन से जुड़े अनेक प्रेरक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि उनका जीवन आज भी राष्ट्रसेवा, चरित्र निर्माण और कर्मयोग का अमर संदेश देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ऐसे कार्यक्रम कर्मचारियों और विद्यार्थियों को अपने गौरवशाली इतिहास तथा सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का कार्य करते हैं।
इससे पूर्व हिन्दी विभाग के सह आचार्य डॉ. सुरेश सिंह राठोड़ ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कर्म की एक नवीन व्याख्या हमारे समक्ष प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि जिस समय अंग्रेजों के शासन में भारतीयों को सांस भी पूछकर लेनी पड़ती थी, उस समय तिलक ने देशवासियों को झकझोरते हुए संपूर्ण स्वतंत्रता का उद्घोष किया। उन्होंने स्वराज के अमृत पान के लिए शिक्षा को आधार बनाया और समाज में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।
डॉ. राठौर ने कहा कि लोकमान्य तिलक ने अनेक अत्याचार सहे, कई बार जेल गए, परंतु कभी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल कर्म, संघर्ष और त्याग से ही प्राप्त होती है। उन्होंने न्यायमुक्त, शोषणमुक्त और अन्यायमुक्त भारत की परिकल्पना की तथा अपने बलिदान से इतिहास की दिशा बदल दी।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की तथा राष्ट्र की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। अंत में कुलसचिव अमरदीप शर्मा ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन जनसंपर्क अधिकारी अनुराधा मित्तल ने किया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के आदर्शों को स्मरण करते हुए विश्वविद्यालय परिसर में राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और कर्तव्यनिष्ठा का भाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ।

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